ख़रीदने को मकान और ब्याहने को बेटे-बेटियाँ
पींगें भरता मन, नापता आकाश की ऊँचाइयाँ।
न कोई अच्छा, न कोई बुरा
मन को जो भाए वो कहाँ जा छुपा?
देखे कितने घर
इसमें कमरा कम, उसमें हवा कम
इसमें दिखता नहीं आकाश,
उसमें बस्ती नहीं पास!
इसमें खिड़की छोटी, इसमें खिड़की बड़ी
घर तो ठीक पर कहाँ होगी खड़ी मेरी गाड़ी?
बेटों की शादी कोई खेल नहीं
हमारी और उनकी पसंद में कोई मेल नहीं
सो बेटों ने भी खूब दौड़ाया
कोई उसे न भाई किसी को वो न भाया
कितनों को भगाया कितनों ने दौड़ाया
यह नौकरी करती है, यह नहीं?
ज़िंदगी की गाड़ी कैसे चलेगी सही?
यह उम्र में बहुत छोटी है यह बहुत बड़ी
यह तो सदा सोफे पर, है मणि सी जड़ी
लड़कियाँ भी कम नहीं
शिकायतें उनकी भी कुछ कम नहीं
इसका परिवार बड़ा है
बहनों का डेरा डला है
किस्सा खत्म होता नहीं यहाँ
बेटियों ने भी खूब नचाया।
अब वे भी नीची नज़र कर हामी नहीं भरती हैं
ऊपर से नीचे तक कमियाँ ही गिनती हैं
इसके
तो जवानी में ही पूनम का चाँद खिला है
इसके गाड़ी नहीं, उसकी तनख़्वाह है कम
इतने में तो गृहस्थी पाएगी नहीं जम!
अरे ये बिन बात क्यों ऐंठा जा रहा है
इसके ढंग देखकर तो,
मेरा दिल ही बैठा जा रहा है
हर कमी को मान बैठते हैं प्रश्न जीवन मरण का
यह तोल तो वह मोल ही दोष है, समझ का
अपना बनाने की पहले सी क़सम न रही
बाज़ार में बैठे-बैठे ज़िंदगी ही निकल गई
ज़िंदगी के चौथे पर
सोचते हैं आज
न घर मिला न ब्याह हुआ,
ज़िंदगी का सफ़र यों ही तमाम हुआ।
-डॉ वंदना मुकेश
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