डॉ उपासना दीक्षित की दो कविताएं

रचनाकार: डॉ उपासना दीक्षित

प्रश्न 

सुनो ध्यान से 
एक दिन तुमसे 
छीन लिया जाएगा 
पहाड़,  नदी,  गांव, पगडंडियां 
और धरा का सौंधा स्पर्श।

खिड़कियों से गुजर कर 
बूढ़ी हो जाएगी धूप भी 
बैठ जाएगी थककर 
उसके टहलने के लिए 
तुमने छोड़ी ही कहां है जगह
वह तो मुंडेरों से ही गुजर कर 
चुक जाती है 

पगडंडियां तो 
लड़ ही रहीं हैं अस्तित्त्व के लिए 
झेल-झेलकर ध्वंस के हथौड़े 
कर दिया स्वयं को 
सरपट दौड़ती जिंदगी के हवाले 
जंगल बढ़ रहे हैं 
अकेलेपन की ओर
ताकि समझ सकें 
जंगलीपन की परिभाषा गढ़ने वाले 
सभ्य समाज के अंदर की सच्चाई 
जो अपने अंधेरेपन से 
जंगल के अंधेरे को निगल रही है 

नदियों के प्रवाह पर प्रहार
पहाड़ों को कर समतल
दर्प से अट्टहास करता दैत्य 
छीन लेगा धीरे -धीरे 
तुम्हारी श्वास
तुम्हारी धरा,  तुम्हारा आकाश 
बांहें फैलाए कातर दृष्टि से 
देख रहे हैं तुम्हें 
कि 
तुम क्या करोगे?

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आस्था

मत ढिंढोरा पीट प्यारे
व्यर्थ का जंजाल जग में 
धर्म के बहुरूपियों ने
कर रखा वबाल जग में 

है ना ईश्वर बीच इनके
ना कहीं कोई आस्था
बस दिखावे की चमक ने
छोड़े कुछ सवाल जग में 
धर्म के बहुरूपियों ने
कर रखा वबाल जग में।।

ईश के जो रूप सच्चे
किससे उसको वास्ता
ऊंचे महलों की सनक ने
खो दिए भगवान सच में 
धर्म के बहुरूपियों ने
कर रखा वबाल जग में।।

हैं कहां सच्ची निगाहें 
बिकती पावन भावना
आन की बोली लगाने 
घुस गए शैतान घर में 
धर्म के बहुरूपियों ने
कर रखा वबाल जग में।।

ठेकेदारी के चलन में
देव बिकते बन खिलौना 
पत्थरों की भव्यता में
चल गया व्यापार पल में 
धर्म के बहुरूपियों ने
कर रखा वबाल जग में।।

सृष्टि है जिसने बनाई
वही जग का है नियंता 
कौन पशु में, कौन मानव 
रच दिया हर एक कण में 
व्यर्थ ही बहुरूपियों ने
कर रखा वबाल जग में।।

-डॉ उपासना दीक्षित