गाँव से मॉल तक का सफ़र

रचनाकार: संधू गगन

गाँव के चौक में
बाबा बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर कहते थे—
“बेटा, ज़िंदगी धीरे-धीरे चलती है,
एक परछाई की तरह”
अब मैं मॉल में खड़ा हूँ

यहाँ परछाई भी AC वाली है
और धूप
डिस्काउंट पर मिलती है।

गाँव में दुकानदार
क्रेडिट पर भरोसा करता था,
मॉल का काउंटर कहता था—
“साहब, कार्ड या QR?”

यहाँ, मुस्कान भी बारकोड के साथ आती है।

वहाँ, माँ के हाथ की बनी रोटी
गोल न होने पर भी स्वादिष्ट होती थी;
यहाँ, पिज़्ज़ा एकदम गोल है—
लेकिन भूख चौकोर रहती है।

गाँव की बातें
सड़कों जैसी लंबी थीं,
मॉल की बातें
एस्केलेटर जैसी—
ऊपर-नीचे,
लेकिन कहीं नहीं पहुँचतीं।
एक खेत था—
मिट्टी से ढका सच।
यहाँ फ़र्श है—
एक चमकता हुआ झूठ,
जिस पर पैर नहीं फिसलते,
लेकिन रूह ज़रूर फिसल जाती है।

गांव से मॉल तक का सफर
सिर्फ दूरी का नहीं है—
मिट्टी से मार्बल तक,
लोन से EMI तक,
लोगों से लोगो तक का बदलाव है।

अब जब भी मैं मॉल जाता हूं,
तो अपने बैग सामान से भर लेता हूं

लेकिन अंदर से खाली लौटता हूं।

कभी-कभी सोचता हूं—
बरगद के पेड़ के नीचे बैठे बाबा
सही थे;
छाया बेचने से नहीं मिलती,
उसे उगाना पड़ता है।

-संधू गगन
माता सुंदरी कॉलेज फॉर विमेन
दिल्ली यूनिवर्सिटी, दिल्ली
मोबाइल : 7888512802