खुदा से बाद नमाज रोज शिकायत करता हूँ--या परवरदिगार तूने मुझे भले ही आदमी की जगह जानवर बना दिया होता लेकिन किसी संस्था का अध्यक्ष बनाया होता। मैं पिछले कई दिनों से अध्यक्ष बनने की पीड़ा भोग रहा हूँ। मेरे कई दोस्त जो बिना किसी कारण के जेल गये थे अध्यक्ष बने घूम रहे हैं।
जब बड़ी पीड़ा आक्रामक होती है तो छोटी पीड़ा का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इसीलिए इन दिनों मुझे सिरदर्द नहीं होता, चाहे जैसी होटलों की सड़ी-गली आकर्षक सामग्री खाता हूँ मितली तक नहीं आती। पहले तो हवा भी बंद हो जाती थी। लेकिन आजकल यह भी शिकायत नहीं है। कुल मिलाकर अध्यक्ष बनने की पीड़ा आक्रामक स्थिति में है।
मैं जानता हूँ इस पीड़ा का इलाज मँहगा होता है। कब्ज होता तो पाँच पैसे का जुलाब लेकर ठीक कर लेता। लेकिन यह बीमारी ज्यादा खर्च माँगती है। कई लोगों को सैकड़ों कप चाय और खारा मीठा खिलाना पड़ता है। कई संस्थाओं को चन्दा देना पड़ता है। सब कुछ कर रहा हूँ लेकिन फिर भी मेरा इलाज नहीं हो पा रहा है।
मेरे एक मित्र हैं जो अनुभवी हैं। कई दिनों तक सक्रिय राजनीति में रहे। कई घरों के छप्पर तक बिकवा दिये। सत्ता परिवर्तन के बाद कस्बे में एक दवाखाना खोल लिया है जहाँ सब प्रकार के राजनीतिक और गैर-राजनीतिक रोगों का इलाज करते है। मैंने उनसे सलाह ली। उन्होंने पूछा--पेट गड़गड़ाता है? वायु विकार भी नहीं है? आजकल यह रोग बहुत चल रहे हैं।
मैंने कहा--मैं शारीरिक रोग से नहीं, राजनीतिक रोग से पीड़ित हूँ। अध्यक्ष बनना चाहता हूँ। वह बोले--इसके लिए पहले योग आसन करना पड़ेगा। यह किताब घर ले जाइये और 'नितंब आसन' वाला पूरा चेप्टर पढ़ डालिये। आपकी तरह कई रोगियों को इससे फायदा हुआ है और वे कई बड़ी संस्थाओं में अध्यक्ष बन गये हैं।
2)
मैं उनके इलाज की प्रक्रिया से गुजर रहा था। इस चेप्टर के आसनों ने मुझे प्रभावित किया था। पहले मैं घर पर अपनी बीवी के सामने इसकी प्रेक्टिस करता और बाद में सामूहिक रूप से उपस्थित दर्शकों को अपनी कलाबाजी दिखाता। लेकिन फिर भी फायदा नहीं हुआ। घर्षण संतोष-जनक नहीं हो पाता था।
मैं दुबारा जब उनके दवाखाने पर पहुंचा तो उन्होंने मेरी नब्ज देखी। कहा--आपका रोग क्रानिक है। योगासन से ठीक नहीं होगा। आप मेरे सेनेटोरियम में भरती हो जाइये। सत्ता के मारे कई रोगी यहाँ इलाज करवा रहे हैं।
मैं भी भर्ती हो गया। मेरे पास के बेड पर जो रोगी थे उन्हें चुनाव के बाद पागलपन के दौरे आने लगे थे। वे बेड पर खड़े हो जाते और भाषण देने लगते थे। विकास की बातें करने लगते थे। देश की चिन्ता से परेशान थे। पिछले दो सालों से इलाज चल रहा था लेकिन दिमाग ठिकाने पर नहीं आता था। मुझे पहली खुराक दी गई। एक भाषण लिख कर दिया गया। रोज सुबह-शाम लेना था। मैं इस मामले में गधा हूँ। पैदा होने के बाद आज तक मैंने भाषण कभी नही दिया। मंच पर खड़ा होता हूँ तो प्रेशर आ जाता है। वह बोले--इस रोग का सही इलाज यहीं शुरू होता है। पहले दिन आर्थिक विकास पर भाषण की खुराक दी गई।
फिर चार दिन बाद दवाई बदली गई और प्रगति पर पुड़िया दी गई। अंत में परिवार नियोजन पर बोलना सिखाया गया तो यह स्थिति थी कि डॉक्टर साहब आते और मैं शुरू हो जाता। खुश हो जाते, कहते--तुम्हें वोकल डायरिया हो गया है। यह अच्छी बात है। बिना इसके तुम्हारा दर्द कम नहीं होगा। तुम थोड़े ही दिनों में इस काबिल हो जाओगे कि कोई भी संस्था तुम्हें अपना अध्यक्ष बना लेगी।
3)
एक दिन मेरा परिचय अध्यक्ष स्पेशलिस्ट से कराया गया। उन्होंने अपना लेटर पेड मेरे बेड पर रख दिया। मैंने देखा कि वे पच्चीस संस्थाओं के अध्यक्ष थे। जमादार यूनियन से लेकर प्रगतिशील साहित्य समिति तक सबसे ऊपर उनका ही नाम था। उन्हें गर्व था कि वे इस दवाखाने के स्थायी मरीज हैं। वे कद से छोटे थे। अपने साथ एक अच्छी काठी की नर्स भी लाये थे। उनकी और देख कर कहा--बेचारी विधवा है। मैं चाहता हूँ कि विधवाओं की एक संस्था बना कर उनके कल्याण के लिए भी कुछ करूं।
मैंने बीच में ही कहा--मैं उस संस्था का अध्यक्ष बनना चाहूँगा। वह मेरी ओर घूर कर देखने लगे। कहा--अभी आपका इलाज चल रहा है। और इलाज में परहेज जरूरी होता है।
वह नर्सनुमा विधवा मुझे आमंत्रण दे रही थी। मेरा दिल नारी सेवा के लिए मचलने लगा था। मैं विधवाओं के सक्रिय राजनीति में योगदान विषय पर भाषण झाड़ने लगा। सभी रोगी जमा हो गए। कम्बखत विधवा थी ही ऐसी। उसे देख कर कौन सक्रिय नहीं होगा। डॉक्टर साहब बोले--अब आराम करो। तुम्हारा इलाज प्रगति पर है। फायदा हो रहा है। मैं यही देखना चाहता था। यह भी इलाज का एक अंश है।
वह चली गई। मैं देखता रहा। एक गुबार जो वह छोड़ गई थी उसे मैं झाड़ रहा था अपने अंदर।
4)
रात में मुझे डरावना स्वप्न आया। मैं चुनाव में हार गया हूँ और वही नर्सनुमा महिला कई हजार मतों से जीत गई है। मेरी नींद खुल गई। बेड गीला हो गया था। दिल की धड़कन तेज हो गई थी। सभी मरीज सो रहे थे। मेरे पास जो मरीज था वह ग्लास में कुछ पी रहा था। पीने के बाद वह विदेश नीति पर बोलने लगा। पूरे सेनेटोरियम में सन्नाटा था। केवल उसकी आवाज दूर तक जाकर वापस लौट रही थी।
मेरी ओर देखकर वह बोला--क्यों, कोई भयानक स्वप्न आया था क्या? मैंने कहा--हाँ। वह फिर जोर का ठहाका लगाकर बोला--अब कल से तुम्हारी छुट्टी हो जायेगी। यही इलाज का अंतिम स्टेज है। इसके बाद तुम्हें जनसेवा के खेतों में चरने के लिए अकेला छोड़ दिया जायेगा। समझे बच्चा।
और वह फिर ठहाके लगाने लगा। भयानक ठहाके। जैसे पिछले तीस सालों में वह पहली बार हँस रहा हो। एक स्वयंसेवक दौड़ कर डॉक्टर को बुला लाया। डॉक्टर ने ठंडे पानी की पट्टियाँ उसके सर पर रखी और निराशा में कहा--नो होप।
सुबह शोकसभा हुई।
सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि मैं इस सभा की अध्यक्षता से अपनी नयी जिंदगी की शुरुआत करूं।
-लतीफ़ घोंघी
[1980]