शासन की बंदूक 

रचनाकार: नागार्जुन

खड़ी हो गई चाँपकर कंकालों की हूक
नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक

उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक
जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक

बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने विनोबा मूक
धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक

सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ-तहाँ दगने लगी शासन की बंदूक

जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक

-नागार्जुन
विशेष : नागार्जुन की यह कविता मारक क्षमता व तीखे व्यंग्य के लिए जानी जाती है। यह आपातकाल के दौरान और सत्ता की निरंकुशता पर आधारित एक सशक्त रचना मानी जाती है।