प्रशांत के तट पर हिंदी का उद्घोष: ब्रिस्बेन में 'प्रशांत क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन' संपन्न

रचनाकार: रोहित कुमार हैप्पी

प्रशांत क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन

16 जनवरी 2026 (ब्रिस्बेन): ऑस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन शहर में हिंदी के वैश्विक प्रसार की दिशा में एक नया अध्याय लिखा गया। भारतीय उच्चायोग (कैनबरा) और भारत के कौंसलावास (ब्रिस्बेन) के संयुक्त तत्वावधान में  शुक्रवार, 16 जनवरी 2026 को ब्रिस्बेन स्थित 'वोको होटल' में ‘प्रशांत क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन’ का भव्य आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक सम्मेलन में ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, फीजी तथा अन्य प्रशांत द्वीप देशों से आए विद्वानों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों और हिंदी प्रेमियों ने हिस्सा लिया।

समारोह का शुभारंभ: संस्कृति और विचार का संगम
सम्मेलन का शुभारंभ भारतीय परंपरा के अनुरूप दीप प्रज्वलन, सरस्वती वंदना और ‘वंदे मातरम्’ के सामूहिक गान के साथ हुआ। इस अवसर पर भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की सचिव (दक्षिण) नीना मल्होत्रा, ऑस्ट्रेलिया में भारत के उच्चायुक्त गोपाल बागले तथा ब्रिस्बेन की कौंसल जनरल नीतू भगोटिया ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज की।

उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर और प्रसिद्ध हिंदी विद्वान पीटर फ्रिडलैंडर

ने अपना सारगर्भित वक्तव्य दिया, जिसने सम्मेलन की दिशा निर्धारित की।

विचार-मंथन: चार प्रमुख सत्र
सम्मेलन की बौद्धिक गहराई चार विशेष पैनल चर्चाओं में देखने को मिली, जहाँ हिंदी के संरक्षण, शिक्षण और तकनीकी विस्तार पर गंभीर विमर्श हुआ।

प्रथम सत्र: प्रवासी समुदाय और नई पीढ़ी

प्रथम सत्र: प्रवासी समुदाय और नई पीढ़ी - संचालक किशोर मिश्रा के नेतृत्व में चले इस सत्र में विजेशनी रतन (न्यूज़ीलैंड), सुभाष शर्मा (मेलबर्न) और अभिषेक मिश्रा (वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया) ने इस बात पर जोर दिया कि प्रवासी हिंदी स्कूलों को नई पीढ़ी के लिए अधिक आकर्षक कैसे बनाया जाए।

 

द्वितीय सत्र: हिंदी शिक्षण की चुनौतियाँ

द्वितीय सत्र: हिंदी शिक्षण की चुनौतियाँ - मधु खन्ना (विश्व हिंदी परिषद) द्वारा संचालित इस सत्र में माला मेहता (सिडनी), अमिता मल्होत्रा (एडिलेड) और आदेश चौहान (विक्टोरिया) ने पाठ्यक्रम संरचना और मूल्यांकन के नए मॉडलों पर प्रकाश डाला।

 

तृतीय सत्र: मीडिया, डिजिटल युग और कृत्रिम मेधा

तृतीय सत्र: मीडिया, डिजिटल युग और कृत्रिम मेधा - यह सत्र सबसे समसामयिक रहा। राशि सक्सेना के संचालन में चार्ल्स थॉमसन (ऑस्ट्रेलियाई योगी), रोहित कुमार (संपादक, भारत-दर्शन) और ज्योति पराशर ने कृत्रिम मेधा (AI) और डिजिटल मीडिया के माध्यम से हिंदी के विस्तार की संभावनाओं को तलाशा।

विशेष सत्र: क्षेत्र की आवाज़ें

विशेष सत्र: 'क्षेत्र की आवाज़ें' - फीजी हिंदी परिषद के अध्यक्ष कमलेश कुमार आर्य के संयोजन में सत्य दत्त, सुभाषिनी लता कुमार और पूजा भारद्वाज ने फीजी और प्रशांत क्षेत्र में हिंदी की स्थिति और भावी कार्ययोजना का खाका खींचा।

स्वामी संयुक्तानंद का बेबाक वक्तव्य

चर्चा का केंद्र: स्वामी संयुक्तानंद का बेबाक वक्तव्य
समापन सत्र में फीजी सेवा आश्रम संघ के अध्यक्ष स्वामी संयुक्तानंद का वक्तव्य विशेष चर्चा का विषय रहा। उन्होंने हिंदी की वर्तमान स्थिति और सांस्कृतिक जड़ों के प्रति अपनी चिंता व्यक्त की। राजनीति से दूर रहने के आयोजकों के अनुरोध पर उन्होंने अपनी बेबाक शैली में कहा:

“मैं एक सन्यासी हूँ, मुझे ऐसा क्यों कहा गया (कि राजनीति पर बात न करूँ), यह मेरी समझ में नहीं आया। यदि हिंदी को जीवित रखना है, तो सांस्कृतिक चेतना को भी जीवित रखना होगा।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति की वाहक है। उन्होंने भाषा के नाम पर राजनीति करने वालों को आड़े हाथों लिया और फीजी में बच्चों की जिज्ञासाओं के समाधान हेतु किए जा रहे कार्यों का उल्लेख किया।

फीजी सेवा आश्रम संघ के अध्यक्ष और प्रवासी भारतीय सम्मान से सम्मानित, स्वामी संयुक्तानंद ने अपने समापन भाषण में समाँ बाँध दिया। उन्होंने भाषा के माध्यम से सभ्यता और आध्यात्मिकता के गहरे जुड़ाव पर प्रकाश डाला।

भारतीय उप-उच्चायुक्त इरीना ठाकुर ने धन्यवाद प्रस्ताव रखा

इसके उपरांत, कैनबरा में भारतीय उप-उच्चायुक्त इरीना ठाकुर ने धन्यवाद प्रस्ताव रखा, जिसके साथ ही वैचारिक सत्रों का औपचारिक समापन हो गया।

सम्मान समारोह
सम्मान
सम्मेलन का समापन एक रंगारंग सांस्कृतिक संध्या के साथ हुआ, जिसमें कविता, नृत्य और संगीत की त्रिवेणी बही। लगभग 120 अतिथियों की उपस्थिति में विशिष्ट महानुभावों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर विश्व हिंदी परिषद द्वारा वर्ष 2026 के कैलेंडर का विमोचन भी किया गया।

यह सम्मेलन प्रशांत क्षेत्र में हिंदी के बढ़ते कदमों और वैश्विक स्वीकार्यता का एक सशक्त प्रमाण बनकर उभरा है।

आधिकारिक टिप्पणियाँ

महावाणिज्यदूत नीतू भगोटिया ने समापन सत्र को संबोधित करते हुए इसे "भारत और ऑस्ट्रेलिया की मजबूत साझेदारी का प्रतिबिंब" बताया। उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई सांसद बिस्मा आसिफ़ सहित अन्य गणमान्य अतिथियों का स्वागत किया और हिंदी को समुदायों को जोड़ने वाले सेतु के रूप में स्थापित करने के लिए सभी की सराहना की।

सांस्कृतिक संध्या कार्यक्रम के अंत में विदेश मंत्रालय की सचिव (दक्षिण) नीना मल्होत्रा ने सम्मेलन से प्राप्त अनुशंसाओं को स्वीकार करते हुए आश्वस्त किया कि ये सुझाव भविष्य की नीतियों और सहयोग की दिशा निर्धारित करने में नींव का काम करेंगे। प्रशांत में हिंदी की चर्चा करते हुए उन्होंने न्यूज़ीलैंड के उच्चायोग द्वारा वेलिंग्टन में हिंदी कक्षाएँ आरंभ करने की भी सराहना की।

उन्होंने ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और फीजी से आए सहभागियों का भी आभार जताया और उनसे एकजुट होकर हिंदी का प्रसार-प्रचार करने का अनुरोध किया।   

उच्चायुक्त गोपाल बागले ने अपने संबोधन में एक ओर जहाँ हिंदी के विस्तार पर प्रसन्नता व्यक्त की, वहीं दूसरी ओर 'बोंडाए बीच' आतंकी हमले पर गहरा दुख जताते हुए ऑस्ट्रेलिया के प्रति भारत की एकजुटता दोहराई। उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई समाज की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हुए, उनके साहस और संयम की सराहना की। हिंदी के इस उत्सव ने उन्होंने गंगा-जमुनी तहज़ीब का हवाला देते हुए अपने लखनवी अंदाज़ में ग़ालिब और मीर को भी याद किया। 

सांस्कृतिक प्रस्तुतियां

विमर्श के बाद, संध्या का माहौल तब और खुशनुमा हो गया जब सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मंच संभाला। दर्शना़ हिंगू; बिंदु राजेंद्रन (मोहिनीअट्टम); मधु खन्ना की कविता ‘मैं हिंदी हूँ’ का मंचन तथा तथा राशि सक्सेना और उनकी बेटी आरना सक्सेना द्वारा "माँ बेटी और मस्ती की पाठशाला" लघुनाटिका के मंचन ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

रात्रि भोज और अनौपचारिक संवाद के साथ यह यादगार आयोजन संपन्न हुआ।

सनद रहे, ऑस्ट्रेलिया में इससे पहले 2006 में एशिया प्रशांत क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन 'सिडनी' में हुआ था। 2020 में फीजी में भी क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन आयोजित हो चुका है। अतः प्रशांत में यह तीसरा क्षेत्रीय सम्मेलन है। न्यूज़ीलैंड में अभी तक इस तरह का कोई सम्मेलन नहीं हुआ है। 

-रोहित कुमार हैप्पी