मौन इतिहास के पन्ने : ऑस्ट्रेलिया में हिंदी

रचनाकार: रोहित कुमार हैप्पी

Hindi in Australia

ऑस्ट्रेलिया में हिंदी

कहा जाता है, ऑस्ट्रेलिया के विश्वविद्यालय में पहली बार हिंदी 1967 से आरंभ हुई! क्या यही अंतिम सत्य है? आइए, देखें--तथ्य क्या कहते हैं? 

प्रकाश चंद्र जैन ऑस्ट्रेलिया के पहले हिंदी व्याख्याता 

1954 में क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के ‘इंस्टीट्यूट ऑफ मॉडर्न लैंग्वेजेज' (IML) में भारत से पढ़ने आए प्रकाश चंद्र जैन, जो विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग में ऑनर्स की डिग्री कर रहे थे, को 1954 में हिंदी के व्याख्याता (Lecturer) के रूप में नियुक्त किया गया था। वे इंस्टीट्यूट ऑफ मॉडर्न लैंग्वेजेज के सांध्य विद्यालय में हिंदी कक्षाएँ लेते थे। 

अकादमिक जगत में हिंदी का संघर्ष: प्रकाश चंद्र जैन (1950 का दशक)

1950 के दशक तक, ऑस्ट्रेलिया में एशियाई भाषाओं का अध्ययन धीरे-धीरे शुरू हो रहा था, लेकिन यह मुख्य रूप से जापानी (युद्ध के बाद के संबंधों के कारण) और इंडोनेशियाई तक सीमित था। हिंदी अकादमिक परिदृश्य से लगभग नदारद थी। इस सूखे में हिंदी की स्थापना का श्रेय किसी स्थापित भाषाविद को नहीं, बल्कि एक इंजीनियरिंग छात्र को जाता है।

क्वींसलैंड विश्वविद्यालय (UQ) और 'इंस्टीट्यूट ऑफ मॉडर्न लैंग्वेजेज'

1950 के दशक के उत्तरार्ध में, क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के 'इंस्टीट्यूट ऑफ मॉडर्न लैंग्वेजेज' (IML) ने हिंदी को अपने पाठ्यक्रम में शामिल करने का निर्णय लिया। समस्या यह थी कि योग्य शिक्षक कहां से लाएं?

भारत से आए मेधावी छात्र प्रकाश चंद्र जैन, जो विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग में ऑनर्स की डिग्री कर रहे थे, को हिंदी के व्याख्याता (Lecturer) के रूप में नियुक्त किया गया।

एक अपारंपरिक नियुक्ति का विश्लेषण

यह नियुक्ति कई स्तरों पर महत्वपूर्ण थी--

संसाधनों की कमी: एक इंजीनियरिंग छात्र को भाषा शिक्षक के रूप में नियुक्त करना यह दर्शाता है कि उस समय ऑस्ट्रेलिया में हिंदी के पेशेवर शिक्षकों का घोर अभाव था।

सामुदायिक योगदान : प्रकाश चंद्र जैन ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दबाव के बावजूद भाषा शिक्षण का दायित्व उठाया। यह उस दौर के भारतीय छात्रों की प्रतिबद्धता को दर्शाता है जो अपनी संस्कृति के अनौपचारिक राजदूत बन गए थे।

पाठ्यक्रम का स्वरूप: चूंकि जैन पेशेवर भाषाविद नहीं थे, इसलिए उनका शिक्षण व्यावहारिक हिंदी और सांस्कृतिक परिचय पर केंद्रित था, न कि क्लिष्ट व्याकरण पर। इसने छात्रों (जो अधिकतर गैर-भारतीय थे) को भारत की संस्कृति से जुड़ने का एक सुलभ मार्ग प्रदान किया।

जैन जैसे व्यक्तियों ने विश्वविद्यालय स्तर पर हिंदी की उपस्थिति दर्ज कराकर यह सुनिश्चित किया कि भारत को केवल एक 'निर्धन देश' के रूप में नहीं, बल्कि एक समृद्ध भाषाई परंपरा वाले राष्ट्र के रूप में देखा जाए।

-रोहित कुमार हैप्पी