कमला रत्नम : ऑस्ट्रेलिया में हिंदी का दीपक जलाने वाली भारतीय विदुषी

रचनाकार: रोहित कुमार हैप्पी

नींव के पत्थर : जिनसे भाषा जीवित है

कमला रत्नम

कमला रत्नम’—यह नाम आज ऑस्ट्रेलिया में बसे अधिकांश प्रवासी भारतीयों के लिए अपरिचित है। हिंदी भाषा से जुड़े समकालीन लेखन, संगोष्ठियों अथवा इतिहास-ग्रंथों में भी उनका उल्लेख प्रायः नहीं मिलता।

पर क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि आज जिस देश में हिंदी शिक्षा के संस्थान, साहित्यिक मंच और सांस्कृतिक आयोजन सशक्त रूप से विद्यमान हैं, वहाँ इसकी पहली आधारशिला एक ऐसी स्त्री ने रखी थी जिसका नाम समय की परतों में लगभग विलुप्त हो चुका है?

आज ऑस्ट्रेलिया में हिंदी का जो सुदृढ़ सांस्कृतिक भवन खड़ा है, उसकी नींव का पहला पत्थर कमला रत्नम ने ही रखा था। नींव के पत्थर प्रायः दिखाई नहीं देते, किंतु उन्हीं पर सम्पूर्ण इमारत का भार टिका होता है।

एक समय था जब उनका नाम ऑस्ट्रेलिया के सांस्कृतिक परिदृश्य में अपरिचित नहीं था। आइए, समय के उस धुंधलके को थोड़ा साफ करें और उस स्त्री को पहचानें जिसने चुपचाप भविष्य के लिए भाषा का बीज बो दिया।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य : 1950 का दशक और भारत–ऑस्ट्रेलिया संबंध

1950 का दशक भारत–ऑस्ट्रेलिया द्विपक्षीय संबंधों के इतिहास में एक संवेदनशील और परिवर्तनकारी कालखंड था। भारत, स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात, अपनी नव-राष्ट्रीय पहचान और गुटनिरपेक्ष विदेश नीति को वैश्विक मंच पर स्थापित करने का प्रयास कर रहा था। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया प्रधानमंत्री रॉबर्ट मेन्ज़ीज़ के नेतृत्व में ‘व्हाइट ऑस्ट्रेलिया नीति’ और पश्चिमी सैन्य गठबंधनों के प्रति अपनी निष्ठा के बीच संतुलन साध रहा था।

इस जटिल भू-राजनीतिक परिवेश में कैनबरा स्थित भारतीय उच्चायोग केवल एक प्रशासनिक संस्था नहीं था, बल्कि वह भारत की सांस्कृतिक उपस्थिति का प्रतिनिधि केंद्र भी था—एक ऐसा मंच जहाँ से दो भिन्न सभ्यताओं के बीच संवाद स्थापित किया जाना था।

कमला रत्नम : एक विदुषी, एक शिक्षाविद, एक सांस्कृतिक दूत

कमला रत्नम की भूमिका किसी पारंपरिक राजनयिक पत्नी की सीमित सामाजिक उपस्थिति तक सीमित नहीं थी। वे एक प्रखर विदुषी, शिक्षाविद, लेखिका और सक्रिय सांस्कृतिक दूत थीं।

वे वरिष्ठ भारतीय राजनयिक पेराला रत्नम की पत्नी थीं, जो 1953 से 1955 के मध्य कैनबरा में भारतीय उच्चायोग में एक महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत थे। इसी अवधि में कमला रत्नम ने ऑस्ट्रेलिया में हिंदी भाषा और भारतीय सांस्कृतिक शिक्षा का बीजारोपण किया।

अपने कैनबरा प्रवास के दौरान उन्होंने न केवल हिंदी और भक्ति साहित्य की नियमित कक्षाएँ संचालित कीं, बल्कि कैनबरा के सेंट एंड्रयूज़ कैथेड्रल (St. Andrew’s Cathedral) के संडे स्कूल में भी अध्यापन कार्य किया तथा धार्मिक उपदेश दिए। यह तथ्य अपने आप में उनकी बहुसांस्कृतिक बौद्धिक क्षमता और संवादधर्मिता का प्रमाण है।

प्रवासी बच्चों के लिए हिंदी का पहला विद्यालय

1950 के दशक में ऑस्ट्रेलिया में भारतीय प्रवासी समुदाय अत्यंत सीमित था और उनके बच्चे पूर्णतः अंग्रेज़ी भाषी सामाजिक वातावरण में पल रहे थे। कमला रत्नम को यह आशंका थी कि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों से कट न जाएँ।

इसी चिंता ने उन्हें एक असाधारण पहल के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपने ही निवास-स्थान से एक रविवारीय हिंदी विद्यालय का आरंभ किया। इस विद्यालय में न केवल उच्चायोग के अधिकारियों के बच्चों को, बल्कि आसपास बसे भारतीय प्रवासियों के बच्चों को भी हिंदी सिखाई जाती थी।

धीरे-धीरे इन कक्षाओं में भारतीय संस्कृति, पौराणिक कथाएँ, भक्ति साहित्य, संगीत और नैतिक मूल्यों का समावेश भी होने लगा।

यह कोई औपचारिक या संस्थागत प्रयास नहीं था। न कोई सरकारी अनुदान, न कोई प्रशासनिक ढाँचा—यह पूरी तरह स्वैच्छिक, सामुदायिक और वैचारिक संकल्प पर आधारित था।

सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामाजिक प्रभाव

कमला रत्नम ने शिक्षा को केवल कक्षा तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने दिवाली, स्वतंत्रता दिवस और अन्य सांस्कृतिक अवसरों पर बच्चों द्वारा हिंदी नाटकों, कविताओं और गीतों के मंचन को प्रोत्साहित किया।

इन कार्यक्रमों में स्थानीय ऑस्ट्रेलियाई नागरिक भी आमंत्रित किए जाते थे। वे स्वयं भी अनेक अवसरों पर स्थानीय समुदाय को संबोधित करती थीं और इस प्रकार भारतीय संस्कृति की एक सौम्य, बौद्धिक और संवादपरक छवि प्रस्तुत करती थीं।

उनके द्वारा आरंभ किया गया यह रविवारीय विद्यालय आगे चलकर ऑस्ट्रेलिया के अन्य शहरों में स्थापित हिंदी शिक्षण केंद्रों के लिए ‘संडे स्कूल मॉडल’ का आधार बना। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज ऑस्ट्रेलिया में संगठित हिंदी शिक्षण की परंपरा की जड़ें उसी प्रयोग में निहित हैं।

एक अनदेखा अध्याय : शीतयुद्ध काल में सांस्कृतिक कूटनीति

कमला रत्नम की कहानी 1950 के दशक की कूटनीति का एक अनदेखा अध्याय भी है। जब विश्व शीतयुद्ध की दो महाशक्तियों में विभाजित हो रहा था और ऑस्ट्रेलिया अपनी नस्लीय पहचान और अंतरराष्ट्रीय भूमिका को लेकर अंतर्द्वंद्व में था, तब कैनबरा के शांत उपनगरों में एक मूक सांस्कृतिक क्रांति आकार ले रही थी।

कमला रत्नम की कक्षाओं में तुलसीदास की चौपाइयाँ गूँजती थीं और चर्च के संडे स्कूल में ईसाई प्रार्थनाएँ। यह केवल भाषा-शिक्षण नहीं था, बल्कि सभ्यताओं के बीच एक सूक्ष्म संवाद था—एक ऐसा सेतु, जो राजनयिक दस्तावेज़ों से अधिक टिकाऊ सिद्ध हुआ।

लेखन और अकादमिक योगदान

कमला रत्नम केवल शिक्षिका ही नहीं थीं, बल्कि सक्रिय लेखिका और चिंतक भी थीं। वे नियमित रूप से प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी पत्रिका The Modern Review जैसी बौद्धिक पत्रिकाओं में लेख लिखती थीं।

उनके लेखों के विषय सोवियत शिक्षा प्रणाली, भाषा-नीति, मातृभाषा में शिक्षण, तथा भारतीय साहित्य तक विस्तृत थे। 1959 में प्रकाशित उनके एक चर्चित लेख में उन्होंने सोवियत संघ में गैर-रूसी भाषाओं के संरक्षण और शिक्षा माध्यम के रूप में मातृभाषा के प्रयोग का विश्लेषण किया—एक विषय जो उनके स्वयं के भाषायी सरोकारों से गहरे जुड़ा था।

वे पुस्तकों की समीक्षाएँ भी करती थीं और समकालीन साहित्यिक विमर्श में सक्रिय रूप से भाग लेती थीं।

लाओस में रामायण : अंतरराष्ट्रीय शोध

ऑस्ट्रेलिया के पश्चात जब पेराला रत्नम को लाओस में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया, तब कमला रत्नम ने वहाँ की संस्कृति और साहित्य का गहन अध्ययन किया।

उन्होंने “The Ramayana in Laos” विषय पर मौलिक शोध किया, जिसमें उन्होंने लाओस के राष्ट्रीय महाकाव्य—जो वाल्मीकि रामायण का स्थानीय रूपांतरण है—का तुलनात्मक और सांस्कृतिक विश्लेषण प्रस्तुत किया।

उनका यह शोधपत्र The Ramayana Revisited तथा अन्य अकादमिक संकलनों में प्रकाशित हुआ और आज भी दक्षिण-पूर्व एशियाई रामायण पर कार्य करने वाले विद्वानों द्वारा उद्धृत किया जाता है।

भाषा के मौन शिल्पकार

कमला रत्नम उन व्यक्तित्वों में से थीं जिनका कार्य मंचों पर नहीं, बल्कि समाज की नींव में दर्ज होता है। उन्होंने न कोई संस्था स्थापित की, न कोई आंदोलन चलाया, न ही किसी पद की आकांक्षा की—पर उन्होंने एक भाषा को प्रवास की भूमि में जीवित रखने का संस्कार बो दिया।

वे हिंदी की प्रचारक नहीं, उसकी संस्कृति-वाहक थीं।

आज जब ऑस्ट्रेलिया में हिंदी केवल एक प्रवासी भाषा नहीं, बल्कि एक संगठित शैक्षणिक और सांस्कृतिक उपस्थिति बन चुकी है, तब यह स्मरण आवश्यक है कि इस यात्रा का पहला दीपक एक विदुषी स्त्री ने जलाया था—कमला रत्नम ने।

वास्तविक अर्थों में--
वे नींव का पत्थर थीं, जिनसे भाषा जीवित है।

-रोहित कुमार 'हैप्पी'