राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है। - बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'

मौज-मस्ती के पल भी आएंगे | ग़ज़ल

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 राजगोपाल सिंह

मौज-मस्ती के पल भी आएंगे
पेड़ होंगे तो फल भी आएंगे

आज की रात मुझको जी ले तू
चांद-तारे तो कल भी आएंगे

चाहतें दोस्ती की पैदा कर
रास्ते तो निकल भी आएंगे

आइने लाए जाएंगे जब तक
लोग चेहरे बदल भी आएंगे

अजनबी बादलों से क्या उम्मीद
आए तो ले के जल भी आएंगे

- राजगोपाल सिंह

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