हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।

कृतघ्नता

चन्द्र हरता है
निशा की कालिमा,
हृदय की देता
उसे है लालिमा॥

किन्तु होकर लोक-
निन्दा से अशंक,
निशा देती है
उसे अपना कलंक॥

-पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी

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