राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है। - बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'

हंसों के वंशज | गीत

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 राजगोपाल सिंह

हंसों के वंशज हैं लेकिन
कव्वों की कर रहे ग़ुलामी
यूँ अनमोल लम्हों की प्रतिदिन
होती देख रहे नीलामी
दर्पण जैसे निर्मल मन को
क्यों पत्थर के नाम कर दिया

पाने का लालच क्या जागा
गाँव की गठरी भी खो बैठे
स्वाभिमान, सम्मान सम्पदा
गिरवी रख कँगले हो बैठे
हरा-भरा संसार न जाने
क्यों पतझर के नाम कर दिया

-राजगोपाल सिंह

 

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