यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।

कभी कभी यूं भी हमने

 (काव्य) 
Print this  
रचनाकार:

 निदा फ़ाज़ली

कभी कभी यूं भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को खुद नहीं समझे औरों को समझाया है

मीरो ग़ालिब के शेरों ने किसका साथ निभाया है
सस्ते गीतों को लिख लिखकर हमने घर बनवाया है

हमसे पूछो इज़्जत वालों की इज़्जत का हाल कभी
हमने भी इक शहर में रहकर थोड़ा नाम कमाया है

उसको भूले मुद्दत गुज़री लेकिन आज न जाने क्यों
आंगन में हंसते बच्चों को बेकारण धमकाया है

उस बस्ती से छूटकर यूं तो हर चेहरे को याद किया
जिससे थोड़ी सी अनबन थी वो अक्सर याद आया है

कोई मिला तो हाथ मिलाया, कहीं गए तो बात की
घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है

--निदा फाज़ली

 

Back
 
Post Comment
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश