राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है। - बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'

स्नेह-निर्झर बह गया है | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

 (काव्य) 
Print this  
रचनाकार:

 सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'

स्नेह-निर्झर बह गया है
रेत ज्यों तन रह गया है।

आम की यह डाल जो सूखी दिखी,
कह रही है--अब यहाँ पिक या शिखी,
नहीं आते; पंक्ति मैं वह हूँ लिखी
नहीं जिसका अर्थ--
जीवन दह गया है।

दिये हैं मैने जगत को फूल-फल,
किया है अपनी प्रतिभा से चकित-चल,
पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल,
ठाट जीवन का वही--
जो ढह गया है।

अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा,
श्याम तृण पर बैठने को निरुपमा।
बह रही है हृदय पर केवल अमा,
मै अलक्षित हूँ, यही
कवि कह गया है।

-निराला

 

Back
 
Post Comment
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश