मैं नहीं समझता, सात समुन्दर पार की अंग्रेजी का इतना अधिकार यहाँ कैसे हो गया। - महात्मा गांधी।

कवि

रचनाकार: भवानी प्रसाद मिश्र | Bhawani Prasad Mishra
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कवि | भवानी प्रसाद मिश्र की कविता | Poem by Bhawani Prasad Mishra

कलम अपनी साध
और मन की बात बिल्कुल ठीक कह एकाध।

यह कि तेरीभर न, हो तो कह
और बहते बने सादे ढंग से तो बह।
जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख,
और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख।
चीज़ ऐसी दे कि जिसका स्वाद सिर चढ़ जाए
बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाए।
फल लगें ऐसे कि सुख-रस, सार और समर्थ
प्राण संचारी की शोभा भर न जिनका अर्थ।

टेढ़ मत पैदा कर गति तीर की अपना,
पाप को कर लक्ष्य, कर दे झूठ को सपना।
विंध्य, रेवा, फूल, फल, बरसात या गरमी
प्यार प्रिय का, कष्ट-कारा, क्रोध या नरमी।
देश या विदेश, मेरा हो कि तेरा हो,
हो विशद विस्तार, चाहे एक घेरा हो।
तू जिसे छू दे दिशा कल्याण हो उसकी,
तू जिसे गा दे सदा वरदान हो उसकी।

-भवानी प्रसाद मिश्र

 

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