भाषा विचार की पोशाक है। - डॉ. जानसन।

दो क्षणिकाएँ    (काव्य)

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Author: मंगलेश डबराल

शब्द

कुछ शब्द चीख़ते हैं
कुछ कपड़े उतार कर
घुस जाते हैं इतिहास में
कुछ हो जाते हैं ख़ामोश


कविता

कविता दिन-भर थकान जैसी थी
और रात में नींद की तरह
सुबह पूछती हुई :
क्या तुमने खाना खाया रात को?

-मंगलेश डबराल

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