विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। - वाल्टर चेनिंग

ऊँचाइयाँ (कथा-कहानी)

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Author: हंसा दीप

ऊँचाइयाँ--डॉ हंसादीप की कहानी

डॉ. आशी अस्थाना का भाषण चल रहा है। वे एक सुलझी हुई नेता हैं। नेता और नारी दोनों की भूमिका ने उनके व्यक्तित्व को ऊँचाइयों तक पहुँचाने में मदद की है। कभी वे अपनी कुर्सी के लिए भाषण देती हैं, कभी नारी की अस्मिता के लिए। उनके विचारों के सख़्त धरातल पर कभी राजनीति हावी होती है, तो कभी समाजनीति। एक ओर सत्ता की डोर को थामे उनके भीतर शासन करने का गर्व छलकता है, दूसरी ओर एक स्त्री होने की क्षमताओं को वजन देते उनके अंदर की नारी शक्ति हिलोरें मारने लगती है। दो मोर्चे एक साथ खोल रखे हैं उन्होंने, एक तो अपने सत्ताधारी दल की अधिकृत प्रवक्ता होने का और दूसरा नारी के ख़िलाफ़ हो रहे अत्याचारों के ख़िलाफ आवाज़ उठाने का।

उनके भाषण बहुत तीखे और बहुत झकझोर देने वाले होते हैं। राजनीति के गलियारों में उनकी आवाज़ विरोधी पार्टियों की खटिया खड़ी कर देती है। एक-एक करके उनके तीखे कटाक्ष और धारदार लहज़ा उन्हें एक आक्रामक नेता की छवि देते हैं। वहीं सामाजिक परिवेश में उनकी आवाज़ पुरुषों के आधिपत्य को जड़मूल से ख़त्म करने की हर संभव कोशिश को अंजाम देने की पुरजोर चेष्टा को बलवती करती है।

राजनैतिक ठेकेदारों का आधिपत्य उनसे ख़ौफ खाता है। जब सत्ता में उनकी पार्टी होती है तब भी, और नहीं होती है तब भी। अपने विरोधी दलों की मिट्टी-पलीत करने में उनका कोई सानी नहीं– “किस देश के विकास की बात करती है यह पार्टी, किसी भुलावे में मत रहिए। उनकी पार्टी देश की नहीं अपनों के विकास की बात करती है। अपनी जेबें ठसाठस भरने से फुरसत कब मिलती है उन्हें जो देश के बारे में सोचें। अपनी आने वाली सात पीढ़ियों की चिंता में लगी ये स्वार्थी दलीय राजनीति की चालें देश को गर्त में ले जाकर ही छोड़ेंगी। हमें देखिए हमने क्या-क्या नहीं किया देश के विकास के लिए। हमारे सारे काम खुली किताब की तरह होते हैं, कुछ छिपा हुआ नहीं होता।”

कई बार इतना समय भी नहीं होता कि वे प्रेस के लिए रुक पाएँ, पूरा काफ़िला तत्काल अगली सभा की ओर बढ़ जाता। कार से जाते हुए रास्ते में पानी पीकर अगली सभा की तैयारियों में जुट जातीं। देश सेवा और समाज सेवा का पसीना मिलकर ऐसा टपकता कि लगता ऐसी ही शक्ति की ज़रूरत है हमारे देश की ज़मीन को कि इस पसीने से बहता पानी ही सूखी ज़मीन की सिंचाई कर दे। उनकी दबंगई गूँजती सत्ता के चौबारों में भी, और समाज के चौराहों पर भी।

तालियों में गूँजती उनकी आवाज़ एक मंच से दूसरे पर जाती तो उनका नज़रिया और सोच, पार्टी से हटकर समाज-सुधार की ओर होते। पित्तृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था पर उनके वार होते और हर शब्द से बगावत की बू आती- “सदियों से होते दमन और शोषण के प्रति चेतना ने स्त्री सशक्तिकरण की लड़ाई को जन्म दिया है। हाशिए पर धकेल दी गई अस्मिताओं को पुन: उनका स्थान दिलाना है। स्त्री की गरिमा को पुन: प्रतिष्ठित करने का महाभियान है यह। स्त्री का दमन पुरुष सत्तात्मक समाज में होता रहा है जहाँ उसे दोयम दर्जे का प्राणी समझा जाता है। लिंग भेद की राजनीति करके आप समाज की प्रतिष्ठा को दाँव पर लगा रहे हैं। समाज के अक्स को बदलो वरना समाज रसातल में जाएगा। कब तक दबाओगे, कब तक अपनी मनमानी करोगे, अरे बस करो अब!”

यहाँ से जाने के पहले पत्रकारों से रूबरू होना अति आवश्यक होता। पत्रकारों के समूह से कुछ महिला पत्रकार उनका इंटरव्यू लेने आगे बढ़तीं। माला और आन्या, वे टीवी एंकर जो अपने-अपने चैनल पर चिल्ला-चिल्ला कर महिलाओं की दबी हुई इच्छाओं को बाहर आने के लिए ललकारती हैं, अपने बुने जाले से बाहर आने का आह्वान करती हैं, किचन से आगे के संसार से मुख़ातिब कराती हैं, उनका सौभाग्य है कि उन्हें आज पहली बार मौका मिला है डॉ. आशी अस्थाना जी से आमना-सामना करने का। ऐसे व्यक्तित्व से साक्षात्कार करने का जिसकी आवाज़ एक आंदोलन है, स्त्री की परम्परागत छवि से एक अलग पहचान बनाने की।

“हमारे दर्शकों को बताइए आशी जी, आप स्त्रियों के अधिकारों के लिए क्या कर रही हैं?”

“मैं पूरी तरह से समर्पित हूँ इसके लिए। हमने संविधान में नयी धाराएँ जोड़ने का प्रावधान किया है। आज ही मेरी प्रधानमंत्री जी से बात हुई है। आपको पता लग जाएगा कि मैं क्या कर रही हूँ।”

“ज़रा दो लाइनों में उनके बारे में बताना चाहेंगी हमारे दर्शकों को।”

“दो लाइनों में, कैसी बात करती हैं आप! हमारा विशाल स्त्री समाज सदियों से इस आग में झुलस रहा है। इस विशालकाय समस्या को बताने के लिए दो लाइनों की नहीं, दो मिनटों की नहीं, दो युगों की जरूरत है।”

“तो क्या आपका गुस्सा पुरुषों पर है?”

“और किस पर होगा। आप ही बताइए, घर की दीवारों पर तो होगा नहीं। घर के बर्तनों पर तो होगा नहीं। यह पुरुष सत्तात्मक समाज है जिसमें हम जीने को मजबूर हैं। हमें चुटकुलों के पात्र बना खी-खी-खी करना बंद करें ये पुरुष। मैं पिछले पचास सालों से इस दिशा में चेतना जगाने का प्रयास कर रही हूँ लेकिन अकेला चना तो भाड़ नहीं फोड़ सकता न। हमारी सारी शक्ति तो रोटियाँ बेलने में लगी है।”

पत्रकार उनकी उम्र देखने लगीं वे पचपन से अधिक की नहीं थीं। लगता है कि चार-पाँच साल की उम्र से ही राजनीति और समाजनीति पर बातें कर रही हैं। समझ भी नहीं होगी कि यह सब क्या होता है, संविधान क्या होता है। खैर, अतिशयोक्ति हो ही जाती है, जोश में थोड़े होश खोना तो बनता है। ऐसे बड़े हस्ताक्षरों के हर शब्द पर नहीं हर अर्थ पर जाना बुद्धिमत्ता है।

“तो आप प्रयास करती रहेंगी औरों को जोड़ने के लिए?”

“निश्चित ही मरते दम तक करती रहूँगी। मेरा नाम आशी है, आशा से बना है और आशा कभी टूटती नहीं। जिस दिन टूटे उस दिन जिजीविषा खत्म होने का अंदेशा होने लगता है। मैं सभी बहनों से अनुरोध करूँगी कि आगे आएँ, महिला शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाएँ और समाज में बराबरी का दर्ज़ा हासिल करें।”

प्रसिद्ध नारी चेतना की संचालक और केन्द्रीय मंत्री का बड़ा तमगा कंधे पर लगने के बाद उनका रोब काफी बढ़ गया था। अपने तमगे से टकरा कर परावर्तित होता, दुगुना होता यह आक्रोश, जब शब्दों में बाहर आता था तो जोश भर जाता था। समारोह में जान आ जाती थी। कार्यकर्ताओं को लगता कि उनकी मेहनत सफ़ल हो गयी। ऐसा दबदबा था उनका, इतना कि उनके सामने किसी की भी बोलती बंद हो जाती। अपने सफल कार्यक्रमों के बाद जब वे घर पहुँचती थीं तो उनका बेटा और पति स्वागत के लिए तैयार रहते। आधे घंटे पहले अव्यवस्थित पड़ी हर चीज़ अपनी जगह पर जाकर मुस्कुराने लगती। किचन का काउंटर टाप साफ हो जाता व फर्श पर बिखरे जूते, मोजे, कचरा-बगदा सब गायब हो जाते।

वे बहुत खुश होतीं, अपनी किस्मत पर रश्क़ करतीं और थकी-हारी आकर चाय के साथ अपने दिन की वर्चस्वता का बखान करतीं। कितना आदर-सत्कार है उनका हर ओर! लोग कितने डरते हैं उनसे! उनके भाषण कौशल्य की दाद हर कोई देता है। एक मिसाल हैं वे अपने राजनैतिक और सामाजिक समाज में। यहाँ तक कि सारे पुरुष नेता भी भयभीत हो जाते हैं कि पता नहीं कब उनकी खिंचाई हो जाए।

घर का माहौल देखते-सुनते, जवान होते बेटे अलंकार को जो समझ में आता था वह यह कि किसी भी लड़की को कभी भी कम नहीं समझना चाहिए। घुट्टी में पी-पीकर अंदर तक पैठ चुकी थी यह समझ। वह स्वयं को देखता और सोचता- “काश, वह एक लड़की के रूप में जन्म लेता! लड़कियाँ कितनी ताकतवर होती हैं! बिल्कुल माँ की तरह होता वह भी, निडर।” लेकिन वह एक लड़का है इसीलिए उसे पापा की तरह रहना होगा। हमेशा डरे-डरे और सहमे-सहमे। शायद इसीलिए खुद को किसी भी लड़की से बहुत कमज़ोर समझता था वह। उसका दिमाग़ लड़कियों से दूर रहने की ताकीद करता रहता। लड़कियों के लिए उसके मन में एक अनजाना-सा डर था ।

पापा को रोज़ देखता था, बचपन से लेकर आज तक। वे घर में तब अधिक रहते थे जब माँ नहीं होतीं। माँ के घर आते ही घर से बाहर जाने का उन्हें कोई न कोई काम निकल आता। देखता था कि माँ के घर आ जाने पर वे किस तरह दबे-दबे रहते हैं। उनकी अनुपस्थिति में वे बिंदास होते थे, मस्त खेलने, हँसने-हँसाने वाले। वह भी डरता था माँ से। जानता था कि माँ उसे बहुत प्यार करती हैं। उसके लिए सब कुछ कर सकती हैं लेकिन पापा के लिए वे कुछ अधिक ही कठोर हैं। पापा को माँ के सामने चुप रहते देख उसे अच्छा नहीं लगता था। पापा की मजबूरी उसकी कमज़ोरी बनती जा रही थी।

इस सबसे बेखबर आशी जी ने अपने रुतबे के साथ अपने अलंकार के लिए लड़की देखना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर उसकी प्रोफाइल लगा दी। संदेश आने-जाने लगे। कुछ प्रस्ताव अपने स्तर के लगे तो अलंकार से बात करनी जरूरी लगी– “बेटे यह लड़की अच्छी लग रही है, इससे बातचीत शुरू करो।” अलंकार देखता, मन से, अनमने मन से, पर देखता जरूर। कोई न कोई ख़ामी नज़र आ ही जाती। माँ का बचाव पक्ष मजबूत होता तो उसे बचने के कोई आसार नहीं दिखाई देते। तब आखिरी हथियार आजमाता, वह साफ कह देता– “मुझे शादी नहीं करनी”।

आमतौर पर हर युवा मन अपनी वैवाहिक गतिविधि को ना-नुकूर से ही शुरू करता है और धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है, यही सोचकर आशी जी आश्वस्त थीं। एक के बाद एक अच्छे-से, ठोक-बजा कर चयन किए गए रिश्तों का यही हश्र होता रहा तो उनका माथा ठनका। अगले रिश्ते में वे अड़ गयीं– “अच्छा बताओ, क्या ठीक नहीं लग रहा? लड़की सुन्दर है, पढ़ी लिखी है, परिवार अच्छा है और क्या चाहिए तुम्हें?”

“ये तो आपके मापदंड हैं, मेरे नहीं।”

“तो तुम अपने मापदंड बताओ, बताओगे नहीं तो पता कैसे चलेगा।”

“आपको पता होना चाहिए, नहीं पता है तो पता लगाइए।”

घुमा-फिरा कर देने वाले जवाब किसी ओर-छोर तक नहीं पहुँचे। आशी जी की तलाश जारी रही और अलंकार का इनकार जारी रहा।

आज सुबह उनका यह आशावादी रवैया डगमगाने लगा था। दिल को धक्का लगा था तब, जब बेटे अलंकार की मेज से एक पेन उठाने गयी थीं। वह सब कुछ, जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी उन्होंने। उसका लैपटॉप खुला था, किसी से प्यार भरी बातें हो रही थीं। वे खुश हुईं– “यह है उसके इनकार का कारण। उसने पहले ही कोई लड़की पसंद कर रखी है। पगला, इतनी सी बात नहीं बता पाया मुझे।”

मगर अगले ही पल जिसकी फोटो देखी वह झकझोर देने वाली थी। यही एक कारण था कि बेहद महत्वपूर्ण समारोह के बाद भी आशी जी तनाव में थीं। भाषण की तैयारियों का जोश धूमिल हो गया था। उस समय यह प्राथमिकता थी, समारोह में जाकर मुख्य अतिथि की भूमिका निबाहने की। वह पूरा होते ही फिर से सुबह की घटना विचलित करने लगी। एक भय था, कहीं परिस्थितियाँ उनके खिलाफ तो नहीं हो रहीं, घर में उनकी अनुपस्थिति किसी भावी संकट की नींव को पुख़्ता तो नहीं कर रही! आशंकाओं के घेरे में सब कुछ ठीक होने की अपनी आशा को कायम रखने की कोशिश कर रही थीं वे।

ऐसी परिस्थिति थी यह, जो इतनी दबंग नारी को निराश कर रही थी। अपने वातानुकूलित चेम्बर में भी पसीना आ रहा था उन्हें। एक झूठा दिलासा था कि शायद वे हर छोटी बात को बहुत गंभीरता से लेती हैं। उतनी गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है। बहुत बार समझाया खुद को कि सब कुछ इस तरह लो जैसे ऐसा कुछ खास नहीं देखा उस फोटो में, जो उसकी स्क्रीन पर था। हो सकता है वहीं किसी लड़की की तस्वीर हो जो छुप गयी हो। उनकी आँखों का भ्रम हो यह। कुछ ज़्यादा ही सोचने लगी थीं वे अपने जवान बेटे के बारे में।

ऐसी छोटी-मोटी बातों से इतनी बेचैनी क्यों। ज़रा-सी बात में बात का बतंगड़ बनाने का कोई फायदा नहीं। अलंकार से बात करके सब कुछ साफ किया जा सकता है। सबसे अच्छा तो यही होगा कि उसकी शादी की बात चलायी जाए। अच्छा रिश्ता मिल जाए तो जल्द से जल्द हाथ पीले कर दिए जाएँ। बेटे के लिए इतना भी नकारात्मक सोचने की जरूरत नहीं है। कई अच्छे रिश्तों की लंबी कतार थी मगर अलंकार का कहीं भी ध्यान नहीं था। रिश्ते पर चर्चा होती, मगर अलंकार हर बार एक ही बात कहता– “उसे शादी नहीं करनी है।”

जो माँ से नहीं कह पा रहा है वह यह कि वह लड़की से बात करते हुए भी डरता है। एक खौफ़ है मन में। जैसी पापा की हालत है वैसी अपनी हालत होते देखता है। आए दिन के माँ के भाषण समारोहों और टीवी कार्यक्रमों को देख पापा की दहशत और बढ़ती थी। उन्हें पता था कि जितना सफल कार्यक्रम होगा उतना अधिक घर का वातावरण रोबीला होगा। इस खौफ़ की वजह से उसका मन कहीं और लग गया है। वह अपने दोस्तों में अपनी खुशी ढूँढने लगा है। हर लड़की से वह दूर रहने की कोशिश करता रहा। कभी भूले से कोई सामने भी आ जाती तो रास्ता काट कर निकल जाता। काली बिल्ली तो अपने रास्ते पर जाते हुए अनजाने में लोगों के रास्ते में पड़ जाती है, बेचारी गालियाँ खाती है। अलंकार स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए किसी और का नहीं, अपना ही रास्ता काटता। अपने घेरे से कभी बाहर ही नहीं आता।

कई बार किसी पारिवारिक शादी के समारोह में जाना पड़ता तो एक ऐसी जगह जाकर बैठता जहाँ कोई उसे देख न सके, या फिर किसी बहाने से वहाँ से बगैर खाए-पीए अपने घर वापस आ जाता। इकलौती संतान होने के जितने फ़ायदे हैं उतने ही नुकसान भी हैं। वह अपनी घुटन को किसी से साझा नहीं कर सकता। अपने अंदर के भय को बाहर नहीं ला पाता। अपने आपको अपराधी पाता है जब पापा चुपचाप माँ के आगे-पीछे बगैर सवाल किए ऐसे चलते हैं जैसे माँ के इशारों पर वे सिर्फ एक कठपुतली की तरह नाच रहे हैं । उसे माँ से बात करना भी अच्छा नहीं लगता। वह उनसे भी दूर रहता। स्त्री मात्र की छाया से भी दूर जहाँ किसी प्रकार का कोई हिटलरी फरमान जारी न हो।

आशी जी की आशा अभी भी साथ थी। मन में दृढ़ निश्चय था कि ऐसी लड़की ढूँढ कर लाएँगी कि देखते ही अलंकार शादी के लिए “हाँ” कर देगा। हर दूर के, पास के रिश्तेदार को सूचित किया कि अलंकार के योग्य कोई रिश्ता नज़र में हो तो तुरंत बताए। एक के बाद एक कई रिश्ते आए, उसने “हाँ” नहीं की तो नहीं की।

अपने स्वभाव के प्रतिकूल शहद जैसी मिठास के साथ पूछा आशी जी ने– “बेटा बात क्या है? मैं भी तो जानूँ, क्यों शादी नहीं करना चाहते तुम?”

“इस लड़की वाली किट-किट से दूर रहना चाहता हूँ मैं।”

“आखिर क्यों?”

“मुझे लड़कियों से सख़्त नफ़रत है।”

“नफ़रत है! क्या किसी ने दिल तोड़ा है तुम्हारा?”

“बचपन से अभी तक कई बार दिल टूटा है माँ, मेरा भी और पापा का भी।”

“तू क्या कह रहा है अलंकार, मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा। शादी नहीं करेगा तो करेगा क्या?”

“शादी तो मैं करूँगा पर किसी लड़की से नहीं।”

“अरे लड़की से नहीं करेगा तो क्या तू लड़के से शादी करेगा?”

“हाँ।”

“अलंकार…”

बेटे के गालों पर एक कस कर थप्पड़ मार देती हैं वे। तमतमाता कर चला जाता है वह।

हवा अब उल्टी दिशा से बह रही थी जो किसी तूफ़ान का संकेत दे रही थी, तबाही का भी। जो देखा था आशी जी ने और जिस सच को नकारने पर तुली हुई थीं, अब वह सामने खड़ा था। एक हट्टे-कट्टे मुस्टंडे का फोटो, जिसको पुच्चियाँ दी जा रही थीं और गंदे इशारे किए जा रहे थे।

ऐसा ही कुछ डॉ. आशी अस्थाना को लग रहा था जैसे कि कोई उनकी अस्मिता को ललकार कर गया है। वह और कोई नहीं, उनका अपना बेटा अलंकार जिसे वे जी-जान से चाहती हैं। वे न तो अपने पति से बात कर पायीं, न अपने बेटे से। इतनी दूरियाँ थीं उन तीनों के बीच कि उन्हें लगा वे बहुत ऊँचाई से उन दोनों को खींचने की कोशिश कर रही हैं। वे इतने नीचे खड़े हैं कि उन तक पहुँचना नामुमकिन है। उनकी हालत उस मकड़ी की तरह हो गयी है जो दीवार की ऊँचाइयों को तो नाप लेती है लेकिन वहाँ बनाए गए बसेरे में उसका अपना कोई नहीं होता।

आशी जी भी अपनी ऊँचाइयों पर अपने आसपास एक जाला बुनते आयी थीं जिसके मजबूत रेशों में वे अंदर तक कैद हो गयी थीं। वे जाले उनके हर अंग को जकड़ रहे थे। जालों के जाल में वे उलझ कर रह गयी थीं। अपने आसपास के उस मकड़जाल में कैद जहाँ से निकलने का कोई रास्ता ही नहीं था।

-हंसा दीप, कनाडा  

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