यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।

बड़ी तुम्हारी भूल (काव्य)

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Author: श्रीधर पाठक

मित्र यह बड़ी तुम्हारी भूल
जो है सुख का मूल उसे तुम समझ रहे हो शूल

कोमल कल्प वृक्ष को मानो कंटक-वृक्ष बबूल
प्रेम-फूल के रस-पराग को गिनो द्वेष- विष-धूल
मित्र यह बड़ी तुम्हारी भूल

जो है अति प्रतिकूल उसी को जानो हो अनुकूल
जरा कष्ट से दब जाते हो, जरा हर्ष से फूल
मित्र यह बड़ी तुम्हारी भूल

-श्रीधर पाठक

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