यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।

एप्रिल फूल  (काव्य)

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Author: प्रो० मनोरंजन

एप्रिल फूल आज है साथी,
आओ, तुमको मूर्ख बनाऊँ;
मैं भी हँसू, हँसो कुछ तुम भी,
फिर तुम मैं, मैं तुम बन जाऊँ।

खामखाह की इस दुनिया में
मूरखता का है कौन ठिकाना;
हम भी मूरख, तुम भी मूरख,
मूरख है यह सकल जमाना।

फिर भी देखो, अजब तमाशा,
सभी यहाँ ज्ञानी बनते हैं;
देखो, ये मिट्टी के पुतले
कितने अभिमानी बनते हैं।

मोटे-मोटे पोथे पढ़कर
कोई तो पंडित बनता है;
कोई उछल-कूद चिल्लाकर
सब सद्गुणमंडित बनता है।

अपनी अपनी डफली लेकर
अपनी अपनी तान सुनाते;
सत्य धर्म का पन्थ यही है,
डंडे से लेकर बतलाते।

क्या जाने यह सत्य धर्म का
मार्ग इन्होंने कैसे जाना;
नित्य चिरन्तन रूप सत्य का
क्या जाने कैसे पहचाना।

फिर भी अपनी ओर खींचते,
अद्भुत है यह खैंचातानी;
आप धरम का मरम न जाने,
औरों के हित बनते ज्ञानी।

कौतुक देखो, राह बताने--
वाले ये भी तो अंधे हैं;
अजब तमाशा है दुनिया के
ये अद्भुत गोरखधन्धे हैं।

धर्मों के ये अजब झमेले,
तू-तू मैं-मैं अजब मची है;
आपस में डंडे चलते हैं,
विधि ने अद्भुत सृष्टि रची है।

धन्यवाद है उस ईश्मा को
जिसे हाथ जोड़े जाते हैं;
लेकर जिसका नाम परस्पर
सर तोड़े-फोड़े जाते हैं।

मानवता के बीच खड़ी हैं
ये कैसी दुर्गम दीवारें;
पागलखानों से पगलों की
आती, कैसी विकट पुकारें।

मेरा धर्म सभी से अच्छा,
पगले जोरों से चिल्लाते;
ये बहिश्त के ठेके वाले
आपस में ही छुरे चलाते।

अग्नि सदा पैदा होगी ही
जितने देते जाओ रगड़े;
हम मनुष्य, ये भी मनुष्य हैं,
आपस के ये कैसे झगड़े?

आओ साथी, हम-तुम हिल-मिल
विमल प्रेम के नाते जोड़ें;
‘तत्त्व धर्म का निहित गुफा में’
उसकी सारी झंझट छोड़े।

छोड़ें सारे बम्ब-बखेडे,
आपस में मिल मोद मनाएँ,
एप्रिल फूल आज है साथी,
आओ, हम-तुम हँसे-हँसाएँ।

- प्रो० मनोरंजन

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