हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी

रत्नावली के दोहे (काव्य)

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Author: रत्नावली

नारि सोइ बड़भागिनी, जाके पीतम पास।
लषि लषि चष सीतल करै, हीतल लहै हुलास ॥ १ ॥

असन बसन भूषन भवन, पिय बिन कछु न सुहाय।
भार रूप जीवन भयो, छिन छिन जिय अकुलाय ॥ २ ॥

पिय साँचो सिंगार तिय सब झूठे सिंगार।
सब सिंगार रतनावली, इक पिय बिनु निस्सार ॥ ३ ॥

नेह सील गुन बित रहित, कामी हूँ पति होय ।
रतनावलि भलि नारि हित, पुज्जदेव सम सोय ॥ ४ ॥

पितु पति सुत सों पृथक रहि, पाव न तिय कल्यान ।
रतनावलि पतिता बनति, हरति दोउ कुल मान ॥ ५ ॥

पति सनमुख हँसमुष रहति, कुसल सकल गृह-काज ।
रतनावलि पति सुषद तिय, धरति जुगल कुल लाज ॥ ६ ॥

जो मन बानी देह सों, पिर्याहि नाहि दुष देति ।
रतनावलि सो साधवी, धनि सुष जग जस लेति ॥ ७ ॥

पति के जीवत निधन हूँ, पति अनरूचत काम |
करति न सो जग जस लहति, पावति गति अभिराम ॥ ८ ॥

रतनावलि पति सों अलग, कह्यो न बरत उपास ।
पति सेवत तिय सकल सुष, पावति सुरपुर वास ॥ ६ ॥

दीन हीन पति त्यागि निज, करति सुपति परबीन ।
दो पति नारि कहायधिक, पावति पद अकुलीन ॥ १0 ॥

धिक सो तिय पर-पति भजति, कहि निदरत जग लोग ।
बिगरत दोऊ लोक तिहि, पावति विधवा जोग ॥ ११ ॥

जाके कर में कर दयो, मात पिता वा भ्रात ।
रतनावलि सह वेद बिधि, सोइ कह्यो पति जात ॥ १२ ॥

-रत्नावली
*तुलसीदास की पत्नी रत्नावली विदुषी थी। उन्होंने अधिकतर नीति दोहे लिखे हैं।

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