हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'। - गोविन्दवल्लभ पंत।

कमलेश भट्ट कमल के हाइकु (काव्य)

Print this

Author: कमलेश भट्ट कमल

कौन मानेगा
सबसे कठिन है
सरल होना!

खाता है बेटा
तृप्त हो जाती है माँ
बिना खाए ही!

समुद्र नहीं
परछाईं खुद की
लाँघो तो जानें !

मुझ में भी हैं
मेरी सात पीढ़ियाँ
तन्हा नहीं मैं!

प्रकृति लिखे
कितनी लिपियों में
सौंदर्य-कथा!

सुन सको तो
गंध-गायन सुनो
पुष्प कंठों का!

पल को सही
बुझने से पहले
लड़ी थी लौ भी!

कहाँ हो कृष्ण
अत्र तत्र सर्वत्र
कंस ही कंस!

यदा यदा हि...
तूने कहा था कृष्णा
याद तो है ना ?

देख लेती हैं
जीवन के सपने
अंधी ऑंखें भी!

-कमलेश भट्ट कमल

Back

 
Post Comment
 
 
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें