साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है। - गणेशशंकर विद्यार्थी।

क़ब्र की मिट्टी (कथा-कहानी)

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Author: खेमराज गुप्त

"अम्माँ, छोटे भैया को क्या हो गया? वह कहाँ गया माँ? और बापू ने उसे गढ़े में क्यों दबा दिया? क्या भैया वहाँ डरेगा नहीं? उसे जब भूख लगेगी तो वह रोयेगा भी, तब उसे दूध कौन पिलायेगा अम्माँ?"

लगातार कितनी ही बार उसने माँ से यही प्रश्न कर डाले और अन्त में बजाये उत्तर देने के माँ ने एक जोर का तमाचा उसके नन्हें कोमल मुँह पर लगाकर कहा था-- 'कलमुँहे, तैने ही उसे मारा है, जब से तू पैदा हुआ है, एक को नहीं तीन-तीन को खा डाला है, नभाग कहीं का!" -और तभी एक ज़ोर का दूसरा थप्पड़ उसके नन्हें से गालों पर आ पड़ा। वह सन्न रह गया, उसे रोना-सा आ रहा था किन्तु वह रो भी नहीं सका।

बाहर आकाश पर काले डरावने बादल तरह-तरह की शक्लें बना-बनाकर बिगाड़ रहे थे - बिगाड़-बिगाड़कर बना रहे थे। उसे लगा मानो, बादल आकाश पर नहीं उसके गाल पर रेंग रहे हों। हतबुद्धि सा वह अपनी माँ का मुँह देखता ही रह गया अभागा मुन्नू!  हाँ, उसे मुन्नू कहते थे सब; हालाँकि उसका नाम मनोहर था। माँ के इस व्यवहार से मुन्नू, हाँ, हाँ, नन्हें मुन्नू के दिल पर गहरी चोट लगी और वह अनमना सा होकर वहाँ से उठ गया ।

आज से छः साल पहले--जब मनोहर पैदा हुआ था--तो हरि गोपाल बाबू ने मुहल्ले भर में लड्डू बँटवाए थे, दिनों तक गाना बजाना होता रहा था। मनोहर जब दो साल का हो गया तो उसे एक नन्हीं सी बहन मिली परन्तु जन्म के पन्द्रह दिनों के पश्चात् ही वह चल बसी, फिर दो भाई हुए, वह भी नहीं बचे; मनोहर अकेला का अकेला ही रह गया।

लगातार तीन बच्चों के मरने से मनोहर की माँ बड़ी क्षुब्ध सी हो गई थी--और फिर मुहल्ले की किसी सयानी ने उसे बताया कि नन्हा मुन्नू यानी मनोहर ही इसका कारण हो सकता है। अपने इस कथन की पुष्टि में सयानी ने अपनी जवानी की एक आपबीती सुना दी। सयानी ने कहा-- मुन्नू की माँ ! तू क्या जाने, जब तेरी उम्र की मैं थी तो मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था--धर्मू के पश्चात् जब मेरे भी तीन बच्चे मर गये तो मुझे भी बहुत चिन्ता रहने लगी। एक रोज़ "उन्होंने" किसी से पता लगाया कि अगर जिस दिन नया बच्चा पैदा हो तो धर्मू को उस बात का पता लगने से पहले ही जी भर कर स्वादिष्ट भोजन खिलाया जाये तो शायद बात बन सकती है। मरता क्या न करता बेटी, मैंने ऐसा किया। आज ईश्वर की दया से सब चैन सुख है, सो कई बच्चे ऐसे दुष्ट होते हैं। फिर सयानी ने इधर-उधर देख कर और मनोहर की माँ के जरा और करीब होकर कहा-- "कई बच्चे जन्म के बैरी होते हैं।" और भी इधर-उधर की कई बातें सुनाकर सयानी चली गई।

बाहर वर्षा होने लगी थी, मुन्नू की माँ चूल्हे के और पास सरक गई--और अनजाने ही उसका ध्यान आग की लपटों में उलझ गया... उसे लगा मानों लपटों में मुन्नू का छोटा भाई बैठा उसे पुकार रहा है, “अम्माँ मुझे गढ़े में डर लग रहा है-- मुझे भूख लगी है अम्माँ..." अम्माँ--" फिर उसे मनोहर का ध्यान आया, "हाय, मैंने मनोहर को क्यों मारा?" उसे लगा मानों मनोहर भी उससे छिना जा रहा है। एक अजीब सा भय, अजीब सी धड़कन से वह काँप उठी। वह तेज़ कदमों से बाहर गई और उन्मत्त सी इधर-उधर कुछ खोजने लगी परन्तु वहाँ कहीं भी मनोहर उसे दिखाई नहीं दिया। 

वह पागलों की भाँति भीतर भाई परन्तु मनोहर का कुछ पता न था। बादलों के काले घेरे के नीचे दिन भी भयंकर काली रात के समान प्रतीत हो रहा था और वर्षा थी मानों आज ही उसे बरसना हो, फिर कभी नहीं। उसने मनोहर के बापू को आवाज़ दी और पूछा, "आप को पता है मनोहर कहाँ है?"

"ना, मुझे तो मालूम नहीं, क्यों क्या बात है?" आशंका से मनोहर के पिता का हृदय सहम उठा।

"मुझे लगता है वह कहीं चला गया है--"

"कहाँ" ?

"छोटे के पास..."

"है"--और वह दोनों मनोहर की तलाश में बाहर निकले, सारा पड़ोस छान मारा, चलते-चलते लगभग दो मील चलकर, वह वहाँ पहुँचे जहाँ छोटे को दबाया गया था, तो उनकी चीख निकल गई।

नन्हें की नन्हीं सी क़ब्र पर मनोहर लेटा था, पास ही एक पत्थर भी पड़ा था, जिस पर शायद मनोहर ने सिर रखकर छोटे को पुकारा था।

-खेमराज गुप्त

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