साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है। - गणेशशंकर विद्यार्थी।

कृष्णा की चूड़ियाँ  (कथा-कहानी)

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Author: कादंबरी मेहरा

कुसुम को नए साल से पहले-पहले कानपुर पहुंचना है। भाई की इकलौती बेटी शुभा की शादी तय हो गयी है। सर पर से माँ का साया वर्षों पहले उठ गया था। शादी की तैय्यारी शुभा कैसे कर पायेगी। नानी के घर से मामा और मामी आयेंगे पर वे पुराने विचारों के लोग ठहरे। कुसुम को कम से कम पंद्रह दिन पहले तो पहुंचना ही चाहिए। दिक्कत ये है कि दिसंबर में भारत की सीट मिलना बड़ा मुश्किल होता है। इमर्जेंसी में बुक करने के दुगुने दाम। कुसुम ने पड़ोसी को अपनी परेशानी बताई तो वह चहक पड़े।

‘‘देखो जी मैं इंतजाम करा दूंगा। हमारे निरंकारियों का भंडारा हो रहा है। भौत लोगों ने जाना है। प्लेन चार्टर करेंगे। विच्चे ई तुसी वी लग जाओ।”

कुसुम को जगह मिल गयी। दाम भी ज्यादा नहीं देने पड़े।

प्लेन कुछ अजीब सा था। था तो बोइंग मगर उसमें कोई क्लास नहीं थी। आगे से लेकर पीछे तक एक सार। कुसुम के सामने दो विशाल शीशे की खिड़कियाँ थीं। आइल के दूसरी तरफ बैठे जोड़े ने हेल्लो कहा और बताया कि यह नई एयरलाइन शुरू हो रही है, प्लेन रूस से सेकंड हैंड खरीदे गए हैं। अपना नाम उन्होंने नईम और राशिदा बतलाया। कुसुम ने अपने सारे देवता परिवार को याद किया और अपने गुनाहों की माफ़ी मन ही मन मांगी। आज बचे तो कल होगी। राजी ख़ुशी पहुंचा देना भगवन!

बैठने के दस मिनट बाद उसकी साथ वाली सीट पर एक मझोले क़द का व्यक्ति आ बैठा। प्लेन चलने में देर हो रही थी। वह शायद आखिरी यात्री था। उसके आते ही प्लेन घुरघुराने लगा। उसके हाथ में एक नहीं चार अदद हैंड बैगेज थे। सब उसने पांवों के सामने अड़ा लिया। कुसुम को पैर खिसकाने पड़े। उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखलाई। गंवार! कुसुम ने सोचा। इसके बाद इत्मीनान से अपना अनोरक उसने उतारा। अपने ब्रीफ़केस में से एक प्लास्टिक का खूब बड़ा बैग निकाला। उसे सहेजकर बैग में रखा। अनोरक के नीचे उसने जॉगिंग सूट पहन रखा था। उसे भी उतारा। उसी एहतियात से तहाया और बड़े बैग के हवाले किया। अब वह अपनी पतलून के मैचिंग सूट में खड़ा था। बाकायदा टाई भी लगाई थी। प्लेन के अंदर खासी गरमी थी। सामने कांच की खिड़कियों से सुबह ग्यारह बजे का सूरज आँखों को तकलीफ दे रहा था। उस आदमी ने अपना ग्रे जैकेट भी उतार दिया। उसे भी तहाया। प्लास्टिक के बैग में अब गुंजाइश नहीं थी। दो एक मिनट सोचता रहा फिर शनील के कम्बल के पैकेट की ज़िप खोलकर उसे करीने से अंदर बिछा दिया और ज़िप बंद की। फिर वह बैठ गया। अब वह पूरी बांह का स्वेटर पहने नज़र आया। दो मिनट बाद यह भी उसे ज्यादा समझ आया तो उसे उतारकर ब्रीफ़केस में ठूंस लिया। और बोला, ‘‘यह तो मेरा अपना है। किसी ने माँगा तो दे भी सकता हूँ।”

अनायास कुसुम ने सर हिला कर उसका समर्थन किया जैसे इतनी देर से वह कुसुम से ही कह सुन रहा हो। इतने में परिचारिका ने आकर उसे पेटी बाँधने और बैठने को कहा। उसी ने सारा सामान सामने दोनों खिड़कियों के बीच बनी एक चोर अलमारी में सहेज दिया। कुसुम ने मन ही मन भगवान का शुकर किया, क्योंकि पाँव रखने कि तो जगह ही नहीं बची थी। ऊपर कोई शेल्फ नहीं बना था। अगर यह नॉर्मल प्लेन होता तो यहाँ पायलट की केबिन होती।

वह अब इतना मोटा नहीं लग रहा था। उसने जूते उतार दिए और सीट बेल्ट टटोलने लगा। कुसुम ने उसकी मदद की तो झेंपा झेंपा मुस्कुराया और पंजाबी मिश्रित हिंदी में बोला, ‘‘सॉरी मैडम। जरा सामान ज्यादा हो गया। की करां मेरा टब्बर भौत है। सब दी फरमाइश। नाले मैं वीस साल बाद पिंड (गाँव) जा रा हाँ।”

भारतवासी जहां तहां अपनी राम कहानी सुनाने लगते हैं। कुसुम ने औपचारिक हाँ हूँ करके अपनी दृष्टि हवाई कंपनी की पत्रिका में गड़ा ली। हवाई जहाज अब बादलों की सरहदें पार कर नीले आकाश में था। वह स्वयं ही कहने लगा, ‘‘मैं तो जी पंडित हाँ। तुसी मैनु टीचर जी लगते हो।”

कुसुम को उसकी सरलता पर हंसी आ गयी, ‘‘नहीं जी, मेरा पोस्ट ऑफिस है।”

‘‘फिर वी, हो तो पढ़े लिखे। मैं तो दसवीं वी नईं कर पाया। की करदा। गाँव में मुंडा हाथ पैर निकाल ले तो उसे खेत पर भेज देते हैं जी। मेरे से बड़ी तिन्न भैना ब्याहन वालियां थीं। पढ़ाता कौन मैनु। वैसे हम रज्जे पुज्जे लोग थे। जमीन, संतरे का बाग तेल की घिरनी, गाय भैंसां। ओ जी बड़ा कुछ।”

कुसुम चुपचाप सुनती रही। परिचारिका जूस ले आई। नईम और राशिदा कुसुम से हिंदी में बातें करने लगे। पंडित जी को लगा कुसुम उनको टाल रही है। वे बीच बीच में प्रश्न पूछते रहे। कुसुम ने बताया कि उसे शादी में जाना है, शुभा विवाह के बाद ऑस्ट्रेलिया चली जायेगी जहां उसे नौकरी मिल गयी है। उसका पति तो पहले ही वहाँ काम कर रहा है।

पंडित जी ने यह सुनकर लम्बी सांस ली। “बस जी कुछ ना पुच्छो। बेटियां जनमती कहाँ हैं और जा पड़ती कहाँ हैं। मेरी भैना वी परदेस व्या गईं। जी मेरी माँ ने पैली वार तो रो रोकर आस्मां सर ते चुक लिता मगर मेरे बाऊ ने समझाया कि भई हमें कोई लंबा चौड़ा दान दहेज़ नईं देना पड़ा। मेरी भैन जब अगली वरी आई तो दूजी नु वी अपने देवर नाल ब्या के ले गयी। कुड़ी मेहनतन होवे और जवाब सवाल न करे तो सारे उसे लाइक करते हैं जी। बस दो साल बाद तीजी का वि नंबर लग गया। कोई पार्टी बर्मिगाओ से आई। जी उसे व्या के लै गए। भौत पैसेवाले। सोनी बड़ी सी। रै गया मैं।”

कुसुम को एक मिनट लगा समझने में कि वह बर्मिंघम में रहती है।

“आपकी बड़ी दोनों बहनें कहाँ पर हैं?”

‘‘ओ जी कुलवंत्री (कोवेंट्री) ते मैं लंदन। मैं जी एक ही भाई था। भैना भौत कुछ मेरे वास्ते भेजती थीं राखी हो या टिक्का। जो वी आंदा जांदा मिलता मेरे वास्ते गिफ्टां ही गिफ्टां। पर मैं तो गरीब गाओंवाला, मेरा व्या होया तो सब घर आये। तीनो के पांच बच्चे। मामा फक्कड़। क्या देता। गाँव में उनके लायक मिलता वी क्या जी। चंगी तरह खिला पिला के गन्ने चुपा के लाडले बालां (बालकों) नु विदा किया। नाल ले जाने वास्ते लड्डू मट्ठियां और अम्ब दा अचार बस।”

पंडित जी की बातों में एक मलाल था, एक बेचारगी। कुसुम ने तसल्ली देते हुए कहा, “यह तो सबसे अच्छा तोहफा है। घर की ताज़ी चीज़ें यहाँ लंदन में खाने को कहाँ मिलती हैं।”

‘‘हाँ जी वो तो ठीक है मगर था तो गरीब का घर। मेरी अपनी फैमिली बढ़ने लगी सुखनाल। तीन बेटे आ गए। कृष्णा का बड़ा मान हो गया। मेरी माँ के तीन कुड़ियां। कृष्णा के पुत्तर ही पुत्तर। वो भी चहकने लगी जी। कैती थी देख तेरी भैना कित्ता सोना पा के आती हैं। बच्चे कितने तमीज वाले बनाये हैं। स्कूल जाते हैं। यहाँ क्या बनेंगे। गोबर चुकेंगे। पैले तो मैं बड़ा शरमाया मगर गाँव कि बात आप जानो। बाऊ को हैजा हो गया। वो चलता बना। शाहूकार का उधार मेरे लिए छोड़ गया। हमारा संतरों का बाग़ निकल गया। दो भैंसे बूढी हो गईं थीं। चारा ज्यादा दूध कम। उनको भी निकाला आमदनी कम। मेरी माँ ने बेटियों से ज्यादा अपनी भैसों को याद करके रोना। ऊपर से कृष्णा को एक बेटी चाहिए थी। गुजारा ही रै गया बस। मैंने वी कमर कस के कया कि कोई राखी टिक्का नहीं जब तक मुझे इंग्लैंड नहीं।”

कुसुम को अब उसकी कहानी में रस आने लगा था। नईम और राशिदा अपने घर की बातें कर रहे थे। कुसुम ने पूछा, ‘‘क्या आपके घर बेटी हुई फिर।”

‘‘ओ जी हो ही गयी। मेरे उप्पर तो एक और डिग्री आ बैठी। चार बच्चे, एक बूढी बीमार माँ। रोज का आया गया। कमाई बस खेत की। पैसे कहाँ थे। बड़ी दोनों तो चुप मार गईं। फिर छोटी, कुक्की अपनी नई बेबी को लेकर घर आई। उसे कृष्णा पर बड़ी दया आई। उसने मेरे को बुलाने का इंतजाम किया। स्पांसर का कागज़ भेजा। किशन महाराज की किरपा नाल मैं इधर आ गया। तब से इधर ही रहा। पैली वार घर जा रहा हूँ।”

कुसुम को इस इंसान से बड़ी सहानुभूति हुई। रवीन्द्रनाथ टैगोर के चरित्र काबुलीवाला की छवि अनायास उसके मन को मथने लगी। जहाज अब यूरोप के ऊपर उड़ रहा था। नीचे जर्मनी का सुप्रसिद्ध ब्लैक फोरेस्ट था। उसके अंचल में फैले खेत रंगोली के नमूने से लगते थे। मशीन से कटे छंटे चौकोर, पंचभुजी या अष्टभुजी आकृतियों में संवारे खेत जिनमें फसलें इस प्रकार रोपी गईं थीं कि उनके रंग अलग अलग बानगी प्रस्तुत कर रहे थे। कुसुम मंत्रमुग्ध उन्हें निहारती रही।

लंच में कुसुम ने शाकाहारी भोजन लिया मगर पंडितजी ने मुर्ग मंगवाया। खाना जब तक समाप्त हुआ सामने का दृश्य फिर बदल गया। जहाज अब स्विस आल्प्स पर से गुज़र रहा था। प्रकृति का अभूतपूर्व नज़ारा! नीला आसमान और उसको लगभग छूती हुई बर्फानी चोटियां। नीचे बर्फ से ढंके हुए असंख्य पर्वत एक दूसरे में उलझे अटके से! उन पर उड़ते बादलों के साये अजीब अजीब शक्लें फेंक रहे थे जिन्हें पढ़ती हुई कुसुम जाने किस स्वप्नलोक में विचरने लगी। कभी लगता वह सामने पड़ी बर्फ को हाथ बढ़ाकर उठा लेगी तो कभी लगता खाई में गिरने वाली है। कभी लगता कि जहाज सामने वाले पहाड़ से टकरा जायेगा तो डर से दिल धड़कने लगता मगर ज्यूँ ज्यूँ आगे बढ़ता पर्वत शृंग परे परे हट जाते।

सहसा पंडित जी ने उससे पूछा, ‘‘मैडम जी ये पहाड़, ये बदल, ये नदियां वगैरह क्योंकर बनाये होंगे बिधाता ने? कित्ते बड़े हाथ होंगे किशन महाराज के हम तो एक घर नहीं बना पाते अकेले। मुझे तो ये ई नईं पता कि हवा पानी किधर से आते हैं।”

कुसुम सरल शब्दों में उसकी अज्ञानता दूर करने लगी। नईम साहब व्यंग से बोले, ‘‘लीजिये आपने तो जुगराफिये की क्लास ही खोल ली। ओ पडत इंग्लैंड में एडल्ट्स की क्लास भी होती है। वापस आके नाम लिखा लेना।‘‘

कुसुम हँसकर चुप हो गयी। पंडितजी बोले, ‘‘क्या करूँ जी मुझे चंगी तरह अंग्रेजी भी नईं आती।”

कुसुम को अचरज हुआ, ‘‘अरे बीस सालों में आपने क्या किया?”

‘‘बस जी पुच्छो मत। पैले आया तो बड़ी भैन के घर टिका। जीजे ने कम्म दिला दिया। एक गोदाम था उसमें झाड़ू लगानी सामान उठाना। इक्क दिन गोरों ने आप ई चोरी कर मारी। मैं सुवेरे सबसे पैले पौंचता था जी। जाकर देख्या कि ताला टूट्या पड़ा है ते शटर अध्धा उप्पर। मैनु शक पड़ गया। कीचड़ वाले बूट दे निशान - अंदर वी बार वी। मैं डर गया। मुड़ घर वापिस आ गया। भैन ने पुच्छा तो मेरा बोल न निकला डर के मारे। जीजे ने देखा समझ गया कि खैर नईं। पुच्छा कि तू अंदर तो नईं गया। मैं कया, नईं जी। मैं तो दूर से देख के वापिस आ रया हूँ। भैन दा पुत्तर अंग्रेजी में बोला यू रन अवे मामा गो एनीवेयर बट नोट हियर।

मैं दूजी भैन के घर भाग के कुलवंतरी (कोवेंट्री) पौंचा। उधर कुछ दिन छुपा रया। फेर जी उसने मुझे अपनी जिठानी के घर लंदन भेज दिया। डरा तो मैं भौत मगर मेरा नाम नहीं लगा न कोई इन्क्वायरी हुई। करते तो आप मरते। क्योंकि मैं तो इल्लीगल कम्म कर रया था जी। रोज़ दा तीन पौंड ते सारा दिन। मैंने किशन महाराज दा शुकर किया। लंदन में बेगाने घर बैठ के रोटी तोड़ने का तो कोई मतलब नहीं था। पास ई बैच अप रोड पे बड़े अस्प्ताल के सामने मार्किट लगती थी। उधर अपने बन्दे भौत। मुझे बक्से उठाने का कम्म मिल गया।”

कुसुम पोस्ट ऑफिस की मालकिन ठहरी। बैच अप रोड नहीं समझी कहाँ होगा। फिर से पूछा कौन सा अस्पताल। पंडित जी ने बताया, “ओ जी सबसे पुराना। फिर उधर से पेटीकोट मार्किट आ जाती है।”

‘‘ओह हो हो! आपका मतलब है वाइट चैपल रोड?”

‘‘ओ जी मैंने अपनी आँखों देख्या। मैं होटल के पिच्छे कूड़ा कचरा फैंकने गया था। करीब दस बारा बैग होते थे रोज़। हमारे कूड़े के डराम तो मेरे से वी उच्चे। दो फेरे कर चुका तो पुलिस की गाड़ी का सायरन सुना। तीन चार गाड़ियां इक्को संग सामने वाले दरवाजे पे आके रुकीं। मैं जल्दी से बाहर हो गया। हाथ में चार बैग कूड़े के थे। मैं उनमें छुप गया। दीवाल से चिपक कर सांस रोके खड़ा रहा जी। कोई चार छै मुस्टंडे होटल में आन धमके और मेजाँ पलटने लगे। मैंने देखा असलम पिछली खिड़की से दूसरे के यार्ड में कूद गया और भागा। मैंने भी डर के मारे बैग पटके और कूड़े के डरामो की आड़ लेकर निकल गया। दोनों जेबों में हाथ डालकर मैं ऐसे चलने लगा जैसे कोई और ही राहगीर हो।

गली के मोड़ पर मैं लेफ्ट मुड़ा। असलम आगे गली के दुसरे छोर पर नज़र आया। फिर किसी घर से शायद अँधेरे में इक्क जनानी सर ते रुमाला बंध के निकली और हमारे विच्च आ गयी। मैनु असलम फेर नईं दिक्खा। जनानी रैट वाली गली में मुड़ गयी। मैं अगले मोड़ से लैफ्ट मुड़ा। कोई दस गज़ परे असलम गिरा पड़ा था। मैं रुका नहीं। मेरे पिच्छे कोई चिल्लाने लगा। हेल्प दी मैन, काल दी अम्बुलन्स। मैंने मुड़कर देखा एक बार मगर जल्दी जल्दी निकल भागा।

बात ये है जी, असलम था तो बड़ा अच्छा मगर धधे पुट्ठे (उलटे) पाल रखे थे। होटल में रात। को जो खाने पीने आते थे उनको ड्रगें सप्लाई करता था। अपने होटल की सारी रसद ढाका से मंगवाता था और खुद हीथ्रो जाकर छुड़ाता था। मेथी धनिये के संग भंग की गठियाँ छुपी होती थीं। गुड की भेली को अंदर से खोखला करके ब्राउन शुगर भरी होती थी। अकेला असलम नहीं था पूरा एक गंग था। उसमें कस्टम वाले भी शामिल थे। इक्क गोरी आती थी होटल में वो असलम को बड़ी जफ्फियां पाती थी। बस जी पुलिस को शक पै गया। मगर जी अंग्रेज होते बड़े गधे हैं। रेड मारनी थी तो सायरन क्यूँ बजाकर आये? दराजें खोलीं। रौला पाया तो चोर निकल भागा।‘‘

‘‘मगर उसे मारा किसने?” कुसुम ने जिज्ञासा से पूछा।

‘‘ओ जी की पता। खबर है उसी गैंग का कोई हो। मोहल्ले में ही रैता होगा। मेरे जान में वोई जनानी काम तमाम कर गयी। हो सकता है कि वो कोई मर्द हो। ठां की अवाज वी नईं होई जी। कैंदे ने पिस्तौल वी बिना अवाज की मिलती है इस मुल्क में। मैं तो कभी उधर मुड़ गया ई नईं। शुकर करो बच गया। दो चार मिनट वी रै जांदा तो पुलिस मुझे पकड़ लेती। जी मेरा पासपोट जो नईं था।‘‘

‘‘फिर?” कुसुम ने सर सहमति में हिलाया।

‘‘फिर जी मैडम मैं सिद्धा स्टेशन आया और मैंने पैली ट्रेन पकड़ी। वो पडिंगटन जा के रुकी। उधर से बस पकड़ के मैं साउथाल आ गया। दिल मेरा धड़ धड़ कर रया था। मगर उप्पर से मैं कूल बना रया। अंदर से किशन महाराज से सौ माफियां माँगी। सारे बुरे काम याद कर कर के भगवन नु गिनाये कि कोई पाप बच ना जाए माफ़ी से। डराइवर कोई अपना ई बन्दा था। मैंने कया मंदिर जाना है। रात के दस बज चुके थे। उसने लेड़ी मार्गरेट रोड वाले मंदिर उतार दिया। मेरी किस्मत से अंदर बत्ती जल रही थी। खड़काने पर दरवाजा खुल गया। असलम ने सिखाया था मर्द की जेब कभी खाली नहीं रखनी। मेरे पास भी दस पांच होते थे। एक भाई ने दरवाज़ा खोला। मैं रो पड़ा। बताया कि कालों ने मारा है। सवेरे चला जाऊंगा। उसने सीढ़ी के पास जगह दिखा दी। कम्बल वी डाल दिया।

सुवेरे चार बजे पंडत ने जगाया। मैंने पैर छू के मत्था टेका। उधर ई नहाया। बताया कि मैं वी पंडत हूँ जात का। नहा धो के मैंने मंदिर में सेवा की थोड़ी भौती। उस दिन भंडारा था किसी का। भंडारे में मेरी दोस्ती स्वामी जगतराम से हो गयी। वो मुझे अपने डेरे पे लै गया। जी वो दस जने इक्को ई कमरे में रैहते थे। रात को गद्दे बिछा लेते थे दिन को इक्क पासे कर देते थे। खाना पीना कभी गुरद्वारे ते कभी मंदिर। नईं तो रॉक्सी हटल में।

‘‘रॉक्सी तो हम भी जाते हैं। खाना अच्छा होता है।”

‘‘ओ जी गुरद्वारे वी बड़ी सेवा होती है। इक्क जनानी सिंधी है। सुवेरे चार बजे से रोटियां लगाती है मक्की की। नाल दाल। जिन मजदूरों ने पैहली शिफ्ट कम्म ते पौंचना होवे ओ सब उधर खाके और लंच दा डिब्बा नाल पैक करा के लै जाते हैं जी। सारा कुछ फ्री।”

‘‘हाँ मगर कमा के लाते हैं तो चढ़ाते भी तो हैं।”

‘‘जगतराम ने मुझे बताया कि वो सब उत्तरकाशी के बाबा तिरशूलवाले सच्चिदानंद के चेले थे। इधर हम काली का मंदर बनाएंगे। मुझे तो जी ते रात को सर छुपाने की जगैह चाहिए थी सो मैं उधर ई ठैर गया। उन सबने रोज़ काली माता की पूजा करनी फिर खा पी के काम पकड़ना। हम सुवेरे सात आठ बजे कैंग स्ट्रैट (किंग स्ट्रीट) लैन लगाते थे। इक्क अंग्रेज ने आना ते सब नू काम देना। बताना पड़ता था कि भई की करना आता है। मुझे पूछा तो जगतराम बोल पया एवरीथिंग गोव। मैनु सीमेंट मिक्सर ते लगा दिया। दूजा बन्दा वी उधर कोई अपना था। ओ समझ गया। नया आया है। उसने परात भर भर के मसाला मुझे पकड़ाया। फिर मिक्सर चलाना वी सिखा दिया। पंज साल मैंने मजूरी की। पैसा बनाया। बराबर घर भेजा। मुझे जी सब काम आ गए। दीवार बना लेता हूँ। पलंबी कर लेता हूँ। नलके वाल्के सब।”

‘‘बस जी किशन महाराज की मैहर है। चढ़ावा भौत आ जाता है। हमारे महंत जी मरे का नई लेते। इक्क बन्दा आया गुजराती। बोला माँ मरने वाली है। गौदान करना चाहती है। महंत जी ने कया जो शरधा हो दे दो। हम गऊ खरीद कर बामन के घर भेज देंगे। सो वो पैसे दे गया। महंत ने कहा तू घर भेज दे और गऊ खरीद ले। मेरी अस्सी साल कि माँ तो ख़ुशी से रो पड़ी जब उसे नवीं गऊ मिली। जब कोई मर जाता है महंत मुझे किरिया करम कराने भेज देता है। छोटी पूजा होती है। ओ जी इधर लोगों को मंतर शंटर नईं आते। बस अंट शंट मैं वी भेड़ लेता हूँ। खाने को भोजन दान दक्षिणा भौत। महंत ने ई सिखाया कि जो पैसा गल्ले में डाले वो मंदिर का। जो तुझे चढ़ाये वो बाँट लेंगे । मैं बड़ी गिफ्टां घर भेजियां। जी मेरे तीनो पुत्तर व्या गए। मैंने बिजलीवाला पम्प लगवाया। मेरा बड़ा बेटा भौत अकल्मन्द है। इस बार संतरों का पेड़ लगाऊंगा।”

‘‘अब तो आपकी बेटी भी ब्याहने लायक हो गयी होगी?‘‘

‘‘हाँ जी। पर वो तो कोई प्रॉब्लम नईं है। उसे इधर ई व्या देना है। मेरी भैनो ने कई मुंडे बताये हैं जी। उनके अपने फैमली वाले ई हैं जी।‘‘

पंडत के स्वर में गर्व भरा था। कुसुम से न रहा गया।” पंडितजी आपके पास पैसा भी हो गया तो भी आप घर नहीं गए?‘‘

‘‘ओ जी आपको तो पता ई है। आया तो मैं सिर्फ छै महीने के वास्ते। मुड़ कभी गया नहीं। मुल्क से बाहर जाता तो पकड़ा न जाता? पासपोट तो था नहीं। इधर वीसा नईं तो घरवाली को कैसे बुलाता? पैसे तो बराबर घर भेजे, “आपकी घरवाली इतने साल से अकेले चला रही है। आपको उसका ख्याल नहीं आया?‘‘ अब कुसुम उसे उपालम्भ सी दे रही थी। मर्द उसे बड़े स्वार्थी लगते थे। खुद खाते पीते मौज करते हैं और पत्नियां घर बैठी सारा काम करती हैं। अपनी कमाई भी पति देवताओं को पकड़ा देती हैं।

पंडित जी शर्मिन्दा होकर बोले, ‘‘कैसे बुलाता जी। उसका उधार जो बाक़ी था मुझ पर। जब तक उसका पूरा इंतजाम न कर लेता कैसे जाता। दुनिया भर के जरूरी कामो में पैसे खर्चे। पुत्तरों को अलग अलग कम्म करा के सैटल किया। व्या कराये। खुड्डी चैन वाली बनवाई घर में। घर पक्का बनवाया। चेला बनाने के ढ़ाई हजार पोंड वसूले तिरशूलवाले गुरु ने। सब चोर बाजारी के धंधे हैं जी। मैंने मजूरी करके हौले हौले चुकाए। मैं अनपढ़ था वो पक्के थे। तभी तो मैंने उन्हें छोड़ दिया। अब थोड़ा हाथ खुला तो रकम जोड़ पाया। कृष्णा का उधार चुकाए बिना उसे क्या मुंह दिखाता?”

‘‘पत्नी का कैसा उधार पंडित जी?” पंडितजी का सारा अभिमान जैसे रसातल में डूब गया था। बेहद झेंपे से आवाज़ को नीची करके बोले, ‘‘बात ही कुछ ऐसी थी मैडम जी। जब मैं लंदन आया था तब मेरे टिकट और वीसा के पैसे कृष्णा ने अपनी चूड़ियाँ बेचकर दिए थे। मैंने जी इतना नीच करम किया कि औरत की चूड़ियाँ बिकाईं। अब मैं आठ चूड़ियाँ बनवा के ले जा रहा हूँ। बल्कि मेरी एक जिजमान ने सुना तो सोने की बालियां भी बनवा दीं। समझो मैं सूद व्याज समेत लौटा पाऊंगा इतने सालों बाद। मर्द को अपनी इज़ज़त रखनी चाहिए!‘‘

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