साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है। - गणेशशंकर विद्यार्थी।

झंझट ख़त्म (कथा-कहानी)

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Author: शिखा वार्ष्णेय

लन्दन में जून का महीना सबसे खुशनुमा होता है। सुबह चार-पाँच बजे से दिन चढ़ आता है। खिड़की से धूप झाँकने लगती है और आप चाहकर भी सोये नहीं रह पाते हैं।

अब ऐसे ही पड़े रहने का क्या फायदा। उठकर जैसे ही खिड़की से पर्दा सरकाया, मार्तण्ड की रश्मियाँ पूरे जोश से कमरे में दाखिल हो गईं।

सुबह की चाय हाथ में लेकर, फ़ोन पर ईमेल खोला तो कुछ प्रोमोशनल ईमेल के साथ ही एक इम्पोर्टेंट मार्क का ईमेल भी था। क्लिक किया तो पता चला ऑफिस के एक कलीग के पिताजी के फ्यूनरल की मीटिंग का सूचना पत्र था। जिनकी मृत्यु पिछले दिनों ही अचानक हार्ट फेल होने से हो गई थी। ईमेल के साथ ही एक डिजिटल कार्ड भी जुड़ा हुआ था। इसमें दो पंक्तियों के एक सन्देश के साथ मीटिंग यानी ‘फ्यूनरल टी’ की जगह का पता, तारीख और समय लिखे हुए थे। और साथ में, आर एस वी पी में उनके बेटे का नाम भी लिखा हुआ था। यानि आप शामिल होंगे या नहीं इसकी सूचना नियत समय से पहले देनी थी। जिससे कि वे आने वालों के हिसाब से इंतजाम कर सकें।

उनकी मृत्यु के दिन तो जाने का सवाल नहीं था। बस घरवाले ही मिलकर उसी दिन उनका संस्कार कर आये थे। सब कुछ व्यवस्थित था ही। बस फ्यूनरल सर्विस को फ़ोन किया और सब हो गया। हम सबको दूसरे दिन खबर लगी थी तो बस कलीग को एक संवेदना वाला सन्देश ही भेज दिया था। पर अब मैसेज आया है तो इसमें तो जाना चाहिए। चाय का स्वाद अचानक फीका सा हो गया। पता नहीं ऐसी कोई ड्रेस भी अलमारी में है या नहीं। फिर वहाँ जाकर करना क्या होता है यह भी तो नहीं पता। वैसे जैसा सुना है लोगों से, यहाँ तो बहुत ही सभ्य और व्यवस्थित तरीके से सब होता है। सब सज धज कर जाते हैं। खाते पीते हैं, मृतक के कुछ नजदीकी लोग उसकी याद में कुछ भाषण देते हैं और बस... फिर सब हाथ मिलाकर अपने अपने घर चले जाते हैं। यूँ तो यहाँ जो भी होता है अब, वो फ्यूजन सा ही होता है। यहाँ की व्यवस्था और अपने धर्म -समुदाय के मुताबिक थोड़ा सामंजस्य बैठाकर काम कर लिए जाते हैं। जैसे मृत्यु पर भी हम भारतीय लोग तो बिना बुलाये भी चले जाते हैं दुख प्रकट करने। फिर संस्कार के बाद एक जगह पर कुछ ड्रिंक्स की व्यवस्था होती है और बस वहां मिलने जुलने की औपचारिकता और शोक और दुख प्रकट करना पूरा हो जाता है। फिर मरने वाला कोई ऐसी हस्ती हो जिसका कि सामाजिक दायरा और पद बड़ा हो तो कुछ दिन बाद “सेलेब्रेशन ऑफ़ लाइफ” नाम से एक भोज और सभा रखी जाती है। जहाँ फिर लोग मृतक को याद कर अपनी अपनी बात कहते हैं। परन्तु हमारे लोग अपने यहाँ की तेरहवीं और इनका सेलेब्रेशन ऑफ़ लाइफ दोनों का फ्यूजन मिलाकर एक भोज सभा सी रख लेते हैं। जिसमें मृतक के सभी जानने वालों को औपचारिक रूप से बुला लिया जाता है। नहीं करने वाले नहीं भी करते। जो भी हो काफी व्यवस्थित होता है सब कुछ। न दहाड़ मार कर रोना धोना, न दुखी होने का दिखावा और न ही फालतू के रिवाज। पर ऑफिस वाली नीति ने बताया था कि बहुत महंगा होता है यह सब और अपने जीते जी ही इसकी व्यवस्था करके जाना होता है। हर एक के जरूरत और बजट के हिसाब से अलग अलग पैकेज हैं फ्यूनरल सर्विस वालों के। महंगे से महंगे। पर बेसिक वाला भी सस्ता नहीं है। बाकी सब भी खुद ही सोच कर, बता कर जाना होता है। कह रही थी उसने अपने लिए फूल भी चुन रखे हैं कि कौन से लगेंगे।

हाए राम ! मैंने तो कुछ भी नहीं सोचा है अब तक। पैसे तो खैर थोड़े बहुत बचा लिए हैं। कल भी मर जाऊं तो बेसिक पैकेज तो आ ही जायेगा। परन्तु और भी तो सोचना है। एक साड़ी भी लेनी होगी। हमारे यहाँ तो लाल पहनाते हैं शायद। पर यहाँ तो टैकी लगेगी वो सबको। मुझे भी लाल रंग कहाँ पसंद है। बहुत लाउड और भड़कीला रंग लगता है। और उसको पसंद करने वाला लगता है बहुत गर्म दिमाग और गुस्सैल सा होगा। कभी कभी खुद पहन लेती हूँ तो लगता है जैसे इस रंग के कपड़े के अन्दर मैं हूँ ही नहीं, कोई और है। शादी पर पहनना पड़ा था तो अजीब सा महसूस हो रहा था मुझे तो। कोई हलके रंग की ले लुंगी। तब भी तो... मैं जो भी चुनूंगी वह, “छीईई...” ही कहेंगे ये घरवाले। फूल तो चलो ठीक हैं। लिली वैसे भी पसंद हैं पति को तो उसमें तो कोई समस्या नहीं होगी। मुझे भी सफ़ेद रंग पसंद है। एक गाना भी तो चुनना होगा। मुझे तो हिन्दी का पुराना गीत ही पसंद है। बचपन से वही पसंद है। न जाने क्यों। जिस उम्र में बच्चे ‘लकड़ी की काठी’ गाते, सुनते थे मैं वह ग़ज़ल नुमा गीत सुनती थी। कैसा सुकून सा था जगजीत सिंह की आवाज में। रूह तक पहुँचती है एकदम। पर वो तो यहाँ कोई नहीं बजाने देगा। बेटी कहेगी, यह क्या समझ आएगा किसी को। कोई वेस्टर्न इंस्ट्रुमेंटल बजा दो। आखिर मिलने वाले तो ज्यादातर उनके ही आयेंगे। जाने के लिए लिमोजीन ठीक रहेगी क्या? अरे नहीं ! इतनी लम्बी क्या करनी, कोई छोटी कार ही देख लूँगी। लेट के पूरी आ जाऊँ बस। पैर न मुड़ें। खाने में भी हाई टी रखवा दूँगी। उसमें वेज - नॉनवेज की समस्या कम होती है। समोसा तो ये अंग्रेज भी शौक से खा लेते हैं। साथ में एक दो तरह के सैंडविच। मन तो मेरा सूशी रखवाने का है। यह जापानी व्यंजन बेहद पसंद है मुझे। समुद्री सिवार सा ये जीवन। उसपर सख्त, मुलायम सब्जियों रूपी सुख- दुख को जमाये रखने के लिए, स्टिकी चावल से ये रिश्ते। ये जिंदगी भी "सूशी" सी तो है। छोटी, रंगीन पर अपने आप में सम्पूर्ण।

परन्तु फिर पति का नाक मुँह सिकुड़ेगा। बेकार में बच्चों की आफत होगी। जाने दो। ये खाना पीना वो अपने आप देख लेंगे अपने हिसाब से। ड्रिंक का तो मुझे पता ही नहीं है वैसे भी। यूँ भी ज्यादा कोई कुछ करेगा नहीं। वरना मन तो मेरा है कि एक खास कविता कोई पढ़ दे वहाँ मेरे नाम से। पर बेटा और पति तो पढ़ने से रहे। बेटी शायद पढ़ दे। पर वहां सुनेगा कौन। छोड़ो। कहेंगे जीते जी तो फ़ालतू काम करती रही सब, मर के भी बोर कर रही है। खैर जो भी हो। जरूरत भर के पैसे जरूर छोड़ जाऊँगी कि किसी पर बोझ न पड़े बाद में। अपने कपड़ों वाली दराज में रख जाऊँगी एक डिब्बे में। पर वहां कैसे दिखेगा किसी को? हाँ सामने की मेज की दराज में रख दूँगी और एक डायरी में सब लिखकर उसे वहीं पास में रख दूंगी।

अरे मम्मी मेरे ईरफ़ोन देखे हैं आपने?

और मेरा चश्मा कहाँ रख दिया ?

अरे देखो न वहीं आँख खोल के। जहाँ होता है वहीं है ।

नहीं मिल रहे हैं न। ज़रा देख दो।

उफ़...किसी को अपनी कोई चीज अपने आप मिलती है इस घर में?

ये हैं तो... एकदम सामने पड़े हैं। ज़रा तो नजरें घुमा लिया करो। इतनी बड़ी बड़ी आँखें दी हैं भगवान ने।

सामने पड़ी चीज तो दिखती नहीं इन्हें। मेज की दराज में जरूर मिल जाएगी डायरी और पैसे हुंह !

अरे इतने झंझट से तो बेहतर है कि कह दूँ कि इंडिया ले जाना। वहाँ मेरे अपने तो होंगे । कुछ कर करा के छुट्टी होगी। ज़रा यहाँ से बॉडी ले जाने का खर्चा ही तो होगा। रख जाऊँगी इतने पैसे तो निकाल कर कहीं। उसके बाद का काम तो वहाँ नाते रिश्तेदार कर लेंगे। इसी बहाने बच्चे इंडिया हो आयेंगे। अपनी मिट्टी में ही मिल जाऊँगी तो क्या पता सुकून आ जाये मरने के बाद कुछ। अरे पर गर्मी में मरी तो मुश्किल हो जाएगी बड़ी। बच्चों को बड़ी परेशानी होगी। बेटे से तो बर्दाश्त ही नहीं होती ज़रा भी गर्मी और बेटी को तो सूरज से ही एलर्जी है। फिर वहाँ भी पता नहीं कैसा इंतजाम होगा। कहाँ करेंगे। अब वहाँ भी कौन ऐसा अपना धरा है जो ढंग से निबटा ले। फिर वो मिलने जुलने वाले। ऐसा रोना – धोना और हंगामा मचाते हैं वहाँ लोग जैसे उनकी ही दुनिया उजड़ गई हो। बेचारे बच्चे तो डर ही जायेंगे। वो तो यहाँ रहते हैं तो मैं बच जाती हूँ इस तरह की नौटंकी देखने, भुगतने से। वरना एक बार इत्तफाक से वहां थी तो जाना पड़ा था किसी के घर ऐसे मौके पर। देखकर दिमाग खराब हो गया था। सारी औरतें एक जगह मजमा सा लगा के बैठी थीं। जैसे ही कोई नया मिलने वाला आता उनका सप्तम स्वर में रुदन शुरू हो जाता। हर बार एक सा समवेत सुर। दो मिनट तक चलता फिर आँख, नाक पल्लू से पोंछकर दुनिया भर की पंचायत शुरू। फिर पाँच मिनट बाद ही सबको चाय, नाश्ता याद आने लगेगा। कोई कहेगा अरे फ्रिज का पानी नहीं है क्या? तो ज़रा बर्फ ही डाल दो, उबल सा रहा पानी। किसी को चीनी वाली चाय चाहिए होगी, किसी को बिना चीनी की, फिर वो हिन्दुस्तानी अंग्रेज फूफाजी आयेंगे तो उनकी पत्नी श्री कहेंगी अरे इनके लिए तो कोई ब्लैक या ग्रीन टी बना दो, दूध वाली से गैस बनती है इन्हें। किसी को खाने को पूरी चाहिए होगी कि कच्चा नहीं बनेगा, तो किसी को रोटी चाहिए होगी कि पूरी नहीं पचेगी। हे भगवान ! कैसे संभालेंगे बच्चे सब। फिर वहाँ के रिवाज। दकियानूसी बातें। बेटी तो हत्थे से उखड़ जायेगी। उसे तो वैसे ही फैमिन्ज्म का कीड़ा है। आखिर बेटी किसकी है। मुझे भी तो कितने बुरे लगते हैं ये सारे रिवाज। बिना मतलब के। औरत मरी तो कफ़न तक मायके से आएगा। बेचारे मायके वाले न हों तो किसी भी दूर दराज के मायके वाले को ढूँढ़ लेंगे। बेशक जीते जी, मरने वाली ने उसका नाम भी न सुना हो। न जाने और भी क्या क्या। तीसरे दिन ये होगा, पाँचवें दिन ये खबेगा, तेरहवीं पे इतने ब्राह्मण आयेंगे। और वहाँ के पंडित, उनका तो बस पूछो ही मत। इतने कानून निकालेंगे हर बात पर कि बेचारा कानून शरमा जाये। ये बेटियों के करने के काम है, यह बस बहुएं करेंगी जी... फलाना काम लड़कियां नहीं कर सकतीं, इस कर्म के लिए बेटा लाओ। बेटा न हो तो कोई ‘बेटा सा’ ले आओ। देवर, भतीजा, यहाँ तक कि पड़ोसी का लड़का भी चलेगा पर नहीं, बेटियां नहीं कर सकतीं।

मेरा बस चले तो ये सारे कर्मकांड ख़त्म करा दूं। बेचारे घरवाले किसी अपने के मरने से इतने दुखी और परेशान न हों जितना ये रिवाज और इन्हें समझाने, मनवाने वाले उन्हें कर दें।

अरे न न ... रहने दो इंडिया। नहीं जाना मुझे। बेचारे सब पहले ही इतने दुखी होंगे। बच्चे तो बहुत रोयेंगे सच्ची। उसपर वहाँ के इतने झंझट। नहीं नहीं। मुझे नहीं करना परेशान उनको बिना बात। बेचारे सब करेंगे भी और सुनेंगे भी। बेकार में फ़ज़ीयत और हो जाएगी।

ये लो! चाय भी ख़त्म हो गई। इंडिया का प्लान कैंसिल। अब चल कर तैयार हो जाऊँ। ऑफिस तो जाना ही पड़ेगा न। मरने के बाद का बाद में सोचा जायेगा। अभी थोड़े न मर रही हूँ। वैसे भी पति कहते रहते हैं दस बीस को मार के ही मरोगी। मजाक ही सही। मन तो बिलकुल नहीं कर रहा आज कहीं भी जाने का, ये मुई मौत दिमाग में जाकर अड़ गई है। एक भी साँस का भरोसा नहीं है। अभी है, दूसरे ही पल सब ख़त्म। आज तो बस मन कर रहा है अकेले उस खिड़की के सहारे लगी कुर्सी पे बैठकर जो पल उपलब्ध हैं उन्हें जी लूं। ऑफिस फ़ोन कर के कह देती हूँ कि तबीयत ठीक नहीं है। फ्लू का मौसम है मान लेंगे सब। वैसे भी नीति के लिए उसकी तीन शिफ्ट कर चुकी हूँ। एक तो वह भी कर सकती है मेरे लिए। संभाल लेगी।

ठीक है। फटाफट कार से स्टोर जाकर कुछ चीजें ले आती हूँ फिर आराम सी बैठूँगी पूरा दिन। कभी किसी के साथ डेट पे तो गई नहीं। आज अपने साथ ही डेट करती हूँ।

खुद के साथ समय बिताती हूँ कुछ।

यह काम भी क्यों छूटे। डेट पे जाना- कितना बकवास सा कांसेप्ट है। कोई मतलब भी है इसका? अरे ऐसे ही मिलने, खाने, फिल्म देखने, बतियाने चले जाओ किसी के भी साथ। ये डेट का क्या मतलब हुआ आज तक नहीं समझ में आया मुझे। वैसे भी ये इश्क, रोमांस कभी पचा ही नहीं मुझे। पर करती है दुनिया। आजकल तो फैशन और बढ़ गया है। अब तो हर चीज की डेट। मूवी डेट, डिनर डेट, अलाना डेट, फलाना डेट। ठीक है ! एक ‘सेल्फ डेट’ भी कर के देख लेते हैं। एक काम यह भी ख़त्म हो।

कार का रेडियो – बेबी डॉल मैं सोने दी ...

चैनल चेंज – यो यो हनी सिंह...

उफ़ इन हिन्दी रेडियो वालों को भी चलाने को कुछ ढंग का नहीं मिलता

अब सुनिए समाचार और मौसम की जानकारी

चलो यही ठीक है।

विज्ञापन – बिना अंग प्रत्यारोपण के मरने वालों में दक्षिणी एशिया मूल के मरीजों की संख्या सर्वाधिक है। क्योंकि वे अपने अंग दान नहीं करते। कृपया मृत्युपरांत अपने अंग और शरीर दान कीजिए और किसी की जिन्दगी बचाइए। आज आप किसी को देंगे तो कल कोई आपके किसी अपने को देगा। अंग या शरीर दान करने के लिए अधिक जानकारी के लिए कृपया इस नंबर पर कॉल करें या इस साइट पर लॉगइन करें।

आह ... मिल गया हल। बस... अब चैन से मरूंगी। झंझट ख़त्म...

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