साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है। - गणेशशंकर विद्यार्थी।

छोटा सा शीश महल (कथा-कहानी)

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Author: अरुणा सब्बरवाल

परेशान थी वह। परेशानियों जैसी परेशानी थी। दिल में एक दर्द जमा बैठा था। पिघलता ही नहीं। आकाश से बर्फ गिरती है। दो-तीन दिन में पिघल जाती है। किंतु कैसी पीड़ा है जिसके फ्रीजिंग प्वाइंट का कुछ पता नहीं। कमबख्त दर्द घुलता ही नहीं। पिघलकर बह क्यों नहीं जाता, पानी की तरह? घुल तो रही थी केवल आशा; रवि की पत्नी।

आज रवि के व्यवहार से उसके मन की कुलबुलाहट बढ़ने लगी। उसने रवि की ऐसी बेरुखी पहले कभी नहीं देखी थी। उसे पूरे दो दशक से ऊपर हो चुके हैं। पूछते-पूछते प्यार से….नम्रता से….रोष से, पर रवि सुनी-अनसुनी करते रहे। आशा भुनभुनाती रही।

आज भी यही क्रम दोहराया गया। बात को टालकर उसे दिलासा-सा देकर रवि नहाने चला गया। आशा तिलमिला उठी। नाश्ता करते वक्त फिर वही सवाल दोहराए जो पिछले पच्चीस सालों से दोहराती आ रही है। क्या हुआ अगर पूछ लिया तो? क्यों नहीं पूछेगी? बार-बार पूछूँगी कहाँ है मेरा बेटा लव? क्या किया उसका? बोलते क्यों नहीं?

झल्ला पड़ा था रवि! पल में फूट पड़ी थी ज्वाला। उगल डाला दबा हुआ क्रोध एक ही साँस में और चिल्लाया, ”क्या किया….? क्या मैंने किया….? अरे करने वाला कोई और ही है….! कब तक रोना रोती रहोगी लव का। न जाने कब छुटकारा मिलेगा इन सवालों से….? आगे बढ़ो….आगे!! इस दर्द से!!!’’

”दर्द…? हाँ-हाँ, वही। तुम क्या जानो माँ का दर्द? तुम माँ जो नहीं हो उसकी!’’ आशा रोष से चीखी।

”हाँ! ठीक कहती हो तुम! मैं माँ नहीं बन सकता पर तुम भी तो बाप नहीं! यह क्यों भूल जाती हो, यह दर्द दोनों का है। भगवान के वास्ते निकलो बाहर इस दर्द के पुराने खंडहर से!’’

रवि बड़बड़ाता रहा। आशा सुबकती रही। रवि फिर बोला, ”समझ नहीं आता क्या करूँ। यही चकिया राग सुन रहा हूँ पच्चीस सालों से। विशेषकर जब कोई उत्सव या खुशी का मौका होता है तुम पुराने संदर्भ लेकर बैठ जाती हो। उसी खंडहर में गुम, पुराने घाव कुरेदने लगती हो। थक गया हूँ तुम्हारे पैरों के नीचे से काँटे उठाते-उठाते। चार कदम आगे बढ़ती हो तो दस कदम पीछे। यूँ लगता है हम अलग-अलग दुनिया के चौराहे पर खड़े हैं। जाहिर तौर से एक दूसरे के समीप मगर ज़हनी तौर से एक दूसरे से कटे हुए। तुम्हारा रुख एक तरफ, मेरा दूसरी तरफ! ….इन बंजर क्षणों को झेलना भारी लगता है।

 

आज की बात ही लो। कितनी आसानी से कह दिया तुमने कि तुम्हारा मूड नहीं जाने का। यह जानते हुए भी कि मिसिज अरोड़ा के साथ हमारे पुराने संबंध हैं जो हम तोड़ नहीं सकते….। आज जो तुम पूरे होशो-हवास में खड़ी हो, सब उन्हीं की बदौलत। शादियाँ कोई रोज़-रोज़ थोड़े ही होती हैं। रिश्तों को बनाकर रखना पड़ता है। उन्हें सींचना पड़ता है। ….चलो उठो, यह वक्त रोने-धोने का नहीं। इस शादी में हमें ज़रूर जाना है। कुश से भी कह दो फोन करके कि वहीं पहुँच जाए। होटल में रात ठहरने की बुकिंग मैं करा लूँगा नेट पर। न्यूकासल से एडिनबरा—चार घंटे की ड्राइव भी है। तैयारी कर लेना। ’’

 

इतना कहकर रवि चला गया।

सामान आदि बाँधते समय आशा थोड़ा आश्वस्त थी। रवि की झिड़की निरर्थक नहीं थीं। उसे याद आया जब वह भारत से नई-नई आई थी। यू.के. में नए लोग, नया वातावरण। ऊपर से डाक्टर के मुँह से अपने माँ बनने की खबर सुनकर उसके मन में खुशी की लहर दौड़ गई। मगर जब पता चला कि उसके जुड़वाँ बच्चे होंगे तो उसका उत्साह ही गुम हो गया। रवि ने आश्वासन दिया कि इस देश में कुछ मुश्किल नहीं, ”चिंता क्यों करती हो। मैं हूँ ना। मिलकर सँभाल लेंगे। यहाँ तो सभी पुरुष अपने परिवार के लालन-पालन व घर के कामों में बराबर का हाथ बँटाते हैं। मेरे दोस्त सुभाष अरोड़ा के भी चार साल के जुड़वाँ लड़के हैं। उनकी पत्नी सिमरन से तुम्हें सब दुविधाओं का समाधान मिल जाएगा।’’

सिमरन ने उसे उत्साहित करते हुए कहा था, ”घबराना क्या? जश्न मनाओ जश्न। दो-दो आ रहे हैं। बाई वन, गेट वन फ्री….तुरंत शॉपिंग शुरू कर दो। ’’ आशा प्रफुल्लित होकर हँस पड़ी थी। बोली, दोनों को चिकित्सा शास्त्र में प्रोफेसर बनाऊँगी। सिमरन उसे पग-पग पर मशविरा देती, लड़कों के नाम, नर्सरी के रंग, अपनी देखभाल आदि-आदि।

आज यही बात टीसती है उसे। ‘जुड़वाँ’ शब्द का प्रसंग आते ही उसकी छातियाँ अकड़ने लगतीं। उसे लगता जैसे लव दूध के लिए रो रहा है।

अचानक फोन की घंटी उसे अतीत से वर्तमान में ले आई। उसने घड़ी पर नज़र डाली, रवि के घर पहुँचने का समय हो गया था। शर्मिंदगी से अपने सिर पर हाथ मारते बोली, बेवकूफ कहीं की, क्यों बार-बार तुम्हारा दिमाग चौबीस वर्ष पहले उसी दिन पर अटक जाता है। खुद को कोसती हुई अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गई।

रवि का दिन भी दफ्तर में टूटा-टूटा-सा गुज़रा। वह खुद पर खफा था….क्यों उसमें इतना साहस नहीं कि आशा को सच-सच बता दे? अपना आक्रोश उस पर निकाल दिया। क्यों अपने क्रोध पर काबू नहीं रखा? दिन में कई बार मन में आया कि घर फोन करके आशा को प्यार के दो बोल सुना दे—पर हर बार उसका अहं आड़े आ गया। पुरुष जो ठहरा!

अगले दिन शनिवार था। रवि और आशा समय से गुरुद्वारे पहुँच गए। कुश भी वहीं आ गया। थ्री-पीस सूट पहने वह राजा लग रहा था। मिस्टर अरोड़ा, सिमरन और उनके जुड़वाँ बेटे अर्शी और कँवल आनन्द कारज पर बैठे थे। पल भर को आशा को लगा जैसे उसके दोनों बेटे लव-कुश बैठे हों। पर अगले ही क्षण वह सँभल गई। कुश का हाथ उसके कंधों के गिर्द लिपटा था। वह किसी जोक पर हँस रहा था। लावों के बाद बधाइयाँ और आशीर्वाद! उसके बाद लंगर। शाम को दुल्हनों का स्वागत एक नामीगिरामी बैंक्वट हॉल में था। नव विवाहित जोड़ों की मंगलकामना के लिए जाम से जाम टकराए। गाना-बजाना, भाँगड़ा, शोर। आशा इनमें कुछ देर खोई रही, तभी किसी ने पूछा।

”आशा, कुश की शादी कब कर रही हो?’’

 

”फेलोशिप करना चाहता है, उसके बाद।’’

आशा सोचने लगी उसके भी तो दो बेटे थे। समय पर दोनों की बहुएँ साथ-साथ लाती। पोते-पोतियों की चहल-पहल होती। आशा के दिल पर दुखदायी स्मृतियों के हथौड़े पड़ने लगे। उसे उसकी अन्दर की उदासी और बाहर के अँधेरों ने घेर लिया। आँसुओं के घिरते बादलों को उसने बड़ी मुश्किल से रोका। दुख सहने की अनंत शक्ति को वह तभी जान पाई थी। सोचने लगी ‘क्या घाव सचमुच भर जाते हैं?’ चौबीस वर्ष का अधूरापन दर्द बनकर उभरने लगा। पलकों पे छाए आँसुओं को समेटने वह बाथरूम चली गई।

आशा के मन में क्या चल रहा था रवि भलीभाँति जानता था। उसके बाथरूम से आते ही वह उसे डांस फ्लोर पर खींच लाया। आशा कभी फिरकी की तरह नाचती थी। रवि का अरमान था उसके साथ नाचने का। दो धुनों के बाद आशा थककर बैठ गई। लोगों की बातें, वातावरण का अथाह शोर उसके कानों को बींधने लगा। उसके भीतर की बेचैनी ने उसे उठने पर बाध्य कर दिया। वह दबे स्वर में बोली, ”चलें। ’’

रवि उसके दर्द से अनजान कब था! उसने प्यार से हाथ बढ़ाते कहा, ”चलो। ’’

होटल के अपरिचित पलंग पर पड़े, दोनों अपने-अपने दुख समेटे, सोने-जागने की बारीक रेखा को एक दूसरे से छुपाते रहे।

”आशा, क्या सोच रही हो?’’ गई रात रवि ने करवट बदलते हुए मुलायम-सी आवाज़ में पूछा।

”कुछ नहीं। ’’

”कुछ तो ज़रूर चल रहा है तुम्हारे दिमाग में?’’

”और आपके?’’

”वही जो तुम्हारे दिमाग में….’’ रवि ने प्यार से उसे अपनी बाँहों में भर लिया।

स्नेह, सहानुभूति का स्पर्श पाते ही आशा रवि से लिपटकर सिसकने लगी। अतीत की यादें जगर-मगर नाचने लगीं।

कितनी खुश थी उस दिन वह?—दो बेटों की माँ! कैसे उचककर नर्स के पूछने से पहले ही दोनों बच्चों के नाम बता दिए थे उसने—’लव’ और ‘कुश’। यही तो दो नाम किशोरावस्था से सोचती आई। लव आगे-आगे और दस मिनट बाद कुश पीछे-पीछे। लव शांत, शालीन—कुसका तक नहीं। और कुश—तेज चुलबुला—चैन से लेटा तक नहीं। मुँह मचोड़-मचोड़ कर अंगड़ाइयाँ ले रहा था।

लव को प्यार से सहलाते रवि झट से बोला, ”बड़ा बेटा बाप पर गया है। ’’

”नहीं-नहीं, यह तो अपनी शरीफ माँ पर गया है। कुश है आपके जैसा, शरारती।’’

 

सब हँस पड़े थे।

रात के आठ बज रहे थे। रवि तो घर चले गए थे दिन भर दफ्तर के थके-हारे। आशा ने देखा लव बहुत देर से हिला डुला नहीं था। दूध पीते समय साँस लेने में अजीब-अजीब-सी आवाज़ें कर रहा था। घबराकर उसने नर्स के लिए घंटी बजाई। नर्स ने लव को देखते ही डॉक्टर को ब्लीप किया। मिनटों में वहाँ डाक्टरों-नर्सों की भीड़ लग गई। लव को वह तुरंत आई.सी.यू. में ले गए। आशा अनहोनी आशंका से काँप उठी। आशा जानने के लिए छटपटा रही थी कि बेटे को हुआ क्या है। उसका कलेजा तड़पकर बाहर आ रहा था। बार-बार नर्सों को पूछती। नर्सें टालती रहीं। उसने एक-दो बार उठने की कोशिश की किंतु पोस्टनैटल हेम्रेज के कारण उसे चलना-फिरना मना था। नर्स उसे हल्की-सी नींद की गोली देकर चली गई।

सुबह होते ही रवि को इत्तला दे दी गई थी। आशा की हालत देखकर उसने भी आशा को कुछ बताना ठीक नहीं समझा। लव को एक हृदय रोग था जो हज़ारों में एक बच्चे को जन्मजात होता है। उसके हृदय का बायाँ कोष्ठक अविकसित रह गया था और इसका इलाज लगभग नामुमकिन था। रवि ने यह आघात अकेले झेला। डॉक्टर लव के नन्हे से हृदय पर अपनी समस्त योग्यता और खोज खर्च करते रहे।

इधर आशा व्यथित हो उठी। सबकी चुप्पी और टाल-मटोल उसे विह्वल किए डाल रही थी। चौबीस घंटे हो गए थे लव को आई.सी.यू. में गए पर कोई खबर नहीं थी। आशा की बेचैनी बढ़ती गई। माँ जो थी वह। ….खुद को रोक ना पाई। आखिर आधी रात को नर्सों की आँख बचाकर वह दबे पाँव आई.सी.यू. की ओर बढ़ी मगर कमजोरी और घबराहट में चक्कर आ गया। वह अपना संतुलन खोकर वहीं फर्श पर लुढ़क गई। वह कई दिनों तक सेमी कोमा में पड़ी रही थी। यही उसे बताया गया था।

यही सब याद करते-करते कब उसकी आँख लग गई उसे पता नहीं चला। अगले दिन एक कुरमुरी सुबह थी। खिड़की से झाँकते सूरज ने उसे जगाया। कुश भी माँ-बाप के साथ वहीं नाश्ता मँगवाकर आ बैठा। वह देर तक गपशप करते रहे। पश्चात सुभाष और सिमरन से विदा लेकर वापस अपने घर न्यू कासल के लिए चल पड़े।

तीन वर्ष और गुजर गए। कुश ने फेलोशिप भी हासिल कर ली। चारों ओर से बधाई संदेशों का अंबार लग गया। दूर-दूर तक दोस्तों को मिठाई बाँटी। कॉलेज के डीन की ओर से बधाईपत्र के साथ ही फेलोशिप की अवॉर्ड सेरेमनी के डिनर व डांस का निमंत्रण था। सुबह शिक्षार्थियों का सम्मानोत्सव, रात को डिनर व डांस, अगले दिन रविवार को कॉलेज की नई प्रयोगशाला का उद्घाटन व प्रदर्शनी। पढ़ते ही दोनों खुशी से उछल पड़े। बेटा उनके स्वप्नों से भी आगे पहुँच गया था। उनके उत्साह की सीमा ना रही।

”आशा, तुम डिनर डांस के लिए अपनी गुलाबी शिफॉन की साड़ी ज़रूर पैक कर लेना। बहुत फबती है तुम पर!’’ रवि ने मनुहार से कहा।

 

”हाँ-हाँ…. आप भी अपनी नई डिनर शर्ट, काली ट्रिमिंग वाला टसकीडो और मैचिंग बो टाई पहनना। कुश को अच्छा लगेगा। ’’

”कुश को?…. और तुम्हें नहीं?’’ रवि ने चुटकी ली।

वह दिन भी आ गया। उन अनमोल क्षणों को कैद करने के लिए रवि ने नया कैमकॉर्डर खरीदा था। उत्सुकता और उत्साह दोनों के कारण रात भर ठीक से नींद भी नहीं आई। सुबह दफ्तर जाते वक्त रवि कह गया, ‘दो बजे तक तैयार रहना। शुक्रवार है ट्रैफिक ज्यादा होगा। एडिनबरॉ पहुँचने में चार के पाँच घंटे भी लग सकते हैं। और सुनो….कैमकॉर्डर रखना मत भूलना। ’

घड़ी की सुई बढ़ती ही ना थी। उसे अभी घर भी बंद करना था। पैकिंग किसी तरह पूरी की। कैमकॉर्डर रखने लगी तो फिर वही ख्याल उसे अवसाद के गह्वर में धकेल गया। रवि ने लव और कुश के कितने फोटो उतारे थे। कहाँ गए सब? कभी दिखाता क्यों नहीं? बस उसकी सारी हँसी आँखों की कोरों में भाप बनकर अटक गई। जब भी पूछती है वही पुरानी कहानी दोहरा देता है उत्तर में।

तुम कोमा में थी। उस रात कितनी बर्फ पड़ी थी! साइबेरिया बन गया था न्यूकासल, इतना हिमपात। चारों ओर बर्फ की मोटी तह और मोटी होती जा रही थी। तीन दिन इंतज़ार किया फिर चर्च की ज़मीन में दफना डाला। जगह याद नहीं।

झूठ! क्या बिना निशान की कब्रें भी होती हैं? उसका तो नाम था। कितने दिन जिया मेरा लाल? कुछ है जो मुझसे छुपाया गया। सिवा रवि के और कौन बताए?

उन दोनों का मौन भी कभी चुप ना रहा। रवि मन ही मन बोलते, ”आशा, भलीभाँति जानता हूँ तुम्हारे प्रश्नों का उठना….तुम्हारा यूँ बिफर जाना भी सही है….मगर उस पल में जो सबसे ठीक लगा मैंने किया….’’

आशा सोचती, ‘तुम नहीं समझोगे….सब कुछ अधूरा-अधूरा अज्ञात के भँवर में फँसा हुआ लगता है। क्यों लव के बिना कुश भी अधूरा लगता है?….बिना पूरा सच जाने मुझे सदा यह क्यों लगता रहा कि मेरा बच्चा अभी है….मुझे आवाज़ दे रहा है….दूध के लिए प्यासा है….

रवि के घर पहुँचते ही आधे घंटे के अंदर ही दोनों एडिनबरा के लिए निकल पड़े। मोटरवे पर जाते ही उसने कार की गति को तेज कर दिया। नब्बे मील की गति से भागने लगी। बेटे की सफलता के नशे में मस्त न जाने कब एडिनबरा आ गया पता ही नहीं चला। रवि बोला, ”आशा, माँ-बाप के लिए इससे अधिक गर्व की बात और क्या बात हो सकती है….? सच मानो बच्चों की सफलता ही माँ-बाप की सफलता है। आज मैं….रवि भल्ला अपने को सफल पिता घोषित करता हूँ। ’’ रवि गर्व से चिल्लाया।

”अकेले ही सारा श्रेय ले लोगे क्या? माँ तो पहली शिक्षक होती है। ’’ आशा ने खिले गुलाब-सी मुस्कराहट के साथ कहा। उसके मन में अनायास कुश की पहली मुस्कान कौंध गई। वह अतीत से खुशियाँ के मोती उठा-उठा कर माला पिरोने लगी—कुश का पहला दाँत, पहला कदम, पहला शब्द, पहला जन्मदिन, पहला स्कूल का दिन….अंत ही नहीं था। कितने वर्षों से सहेजती आ रही थी इन सुखदायी क्षणों को, पर कभी खुलकर उनका उत्सव नहीं मनाया….आज भी नहीं….।

कार चलाते हुए रवि ने उसकी मुस्कान को तिरोहित होते हुए महसूस किया। उसकी निर्बाध खुशी पर जैसे तुषारापात हो गया हो। एकदम से झल्लाकर बोला, ”कम से कम आज तो विदा कर दो अपनी व्यथा को! क्या मिल गया जो अब मिल जाएगा? जो जीवित है, तुम्हारे सामने खड़ा है, क्या तुम उसके सुख के लिए उमड़ते बादलों को दबाकर मुस्करा नहीं सकतीं….? हर खुशी के अवसर पर नई मुश्किल खड़ी करके उसे किरकिरा कर देती हो। ….क्या कुश को खरे सोने के जैसा शुद्ध आशीर्वाद नहीं दे सकतीं? उसने हमें जो दिया उसके बदले यह खोट मिली नकली मुस्कान? माँ हो—अब सिर्फ उसकी माँ!

”क्या करूँ—कोख अपना हक माँगती है।’’

”किससे? रोक सकती थी क्या तुम उसे? या मैं रोक लेता? सँभालो अपने आप को। हमारा कुश….तुम्हारा जाया—दो क्या आज दस के बराबर है। अब से हर पल उसकी खुशी के लिए जीना ही तुम्हारा धर्म है। इससे ज्यादा और क्या महत्वपूर्ण है तुम्हारे लिए?’’

कुछ पल दोनों में मौन वार्तालाप का सिलसिला जारी रहा। आशा मन ही मन में बड़बड़ाती रही।

”हाँ-हाँ…. पूछूँगी….बार-बार पूछूँगी….हर बार वही पुरानी मनगढ़ंत कहानी सुना देते हैं, तुम कोमा में थीं….चारों ओर बर्फ ही बर्फ जमी थी….बल्ला….बल्ला इत्यादि।

रवि भी मन ही मन बड़बड़ाते रहे, ”आशा, मैं अच्छी तरह जानता हूँ तुम्हारे प्रश्नों का उठना, बिखर जाना ही सही है। ’’

”तुम नहीं समझोगे, सब कुछ अधूरा-अधूरा अज्ञात के भँवर में फँसा लगता है।’’

”निकलो उस भँवर से, बहुत हो गया।’’

रवि ने अपना बायाँ हाथ आशा के हाथ पर रखा। आशा ने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर चूम लिया। आज पहली बार आशा को अपनी कमजोरी का दुख हुआ। ‘नहीं….अब नहीं रोऊँगी। जो जिंदा है उसके लिए जिऊँगी, खुशी से। ’

रवि ने उसकी मूक प्रतिज्ञा को जैसे पढ़ लिया।

दोनों एक-दूसरे की ओर मुस्करा दिए।

कार कॉलेज के अहाते में आकर रुकी। सामने से कुश आता नज़र आया। दोनों ने उसकी पीठ थपथपाई और शाबाशी दी। आते-जाते अनजान लोग उन्हें बधाई कह रहे थे। दूसरी सुबह समारोह निश्चित समय पर शुरू हुआ। अनगिनत श्रोता। पूरी फैकल्टी अपने काले गाउन और हैट लगाए परेड करती हुई जब अपने-अपने स्थान ग्रहण करने लगी तो स्कॉटिश बैग पाइप बैंड ने स्वागत धुन बजाई। आशा को झुरझुरी आ गई। इसके बाद शिक्षार्थियों को उनकी सफलता के प्रमाणपत्र दिए गए। आशा और रवि के हाथ कसकर एक मुट्ठी में बँध गए। खुशी के आँसू बह निकले। सामने कुश को प्रथम श्रेणी का विशेष मैडल भेंट किया गया। विभिन्न जातियों, विभिन्न देशों, विभिन्न भाषा-भाषियों से हॉल खचाखच भरा था परंतु आज इस वेला में वह सब समान रूप से इस वैश्विक परिवार के सदस्य थे। सबका एक रुतबा था, एक जात थी—वह सब सफलता के सर्वोत्तम शिखर पर खड़े चिकित्सकों के अभिभावक थे—गर्व और आत्म सम्मान के अधिकारी!

समारोह के बाद रवि ने कुश से पूछा, ”आगे क्या करने का इरादा है बेटे?’’

”पापा, मैं पढ़ाना चाहता हूँ। प्रोफेसर बनना चाहता हूँ। डाक्टरी और मरीजों का इलाज तो साथ-साथ चलता ही रहेगा।’’

शाम को डिनर के लिए रवि और आशा अच्छे-से सज-बनकर तैयार हुए।

”वाह, यह हुई ना बात! कभी हमारे लिए भी ऐसे तैयार हो जाया करो….!’’ रवि ने आशा को खुश करने के लिए कहा।

”आप भी ना!….’’ आशा शरमाकर मुस्करा दी।

डिनर हॉल की सजावट अद्वितीय थी। दोनों आश्चर्यचकित रह गए। इतनी खातिरदारी, इतनी गहमागहमी—पहले कभी नहीं देखी थी। प्रत्येक मेहमान को यह अहसास दिलाया गया कि वही खास मेहमान है। नम्रता व नफासत, दिखावा और शराफत सब भरपूर। क्या शान थी!

दावत के बाद कॉलेज की टीम की ओर से डीन ने सभी अतिथियों को धन्यवाद दिया और नई प्रयोगशाला के उद्घाटन का उद्घोष किया। अगले दिन सुबह दस बजे सबको उद्घाटन समारोह के लिए आमंत्रित किया।

”मेरा आप सबसे अनुरोध है कि आप सब पधारें और देखें कि आपके बच्चों को इस मुकाम तक पहुँचाने में पर्दे के पीछे कितने लोगों का सहयोग रहा है। आपके यहाँ आने का शुक्रिया। अब आप बाकी शाम का आनंद लीजिए….’’

बारह बजते ही तीनों अपने-अपने होटल की ओर चल दिए। रवि की रात धज्जी-धज्जी गुजरी। रात भर उसके मस्तिष्क में वही काली रात घूमती रही।

उसके मन में अलग ही सागर मंथन चलने लगा। हमेशा आशा की भावनाओं को महत्वहीन करार देकर क्या वह अपने दिल में बसे चोर को भगा पाया कभी? आशा का मूक आश्वासन उसे अपने अपराधबोध से लड़ने के लिए छोड़ गया। कितना कमजोर था वह जो इतने सालों तक उसे सच बताने का साहस न कर पाया! किससे डरता था? आशा से—कि वह सहन नहीं कर पाएगी? या अपनी उस झूठी महानता से जिसकी झोंक में उसने अपने नन्हे से नवजात को मानव-सेवा के लिए अर्पण कर दिया? उफ! क्या गुजरी होगी उस नाज़ुक-से शव पर? किस-किस ने चीर-फाड़ की होगी? क्यों उसने डा. फर्ग्यूसन का प्रस्ताव ठुकराया। लव को जन्मजात हृदय रोग था जो हज़ारों में एक को होता है। लव चिकित्साशास्त्र के लिए एक अमूल्य उदाहरण था। उस पर अन्वेषण करके बहुत कुछ सीखा जा सकता था।

 

उस वक्त आशा अपने कक्ष में थी नीम बेहोश। रवि लव के पास आई.सी.यू. में भागा था। डॉ. फर्ग्यूसन उस नन्हीं सी जान को ऑक्सीजन चढ़ाते रहे। दो अन्य प्रोफेसर—उनके वरिष्ठ चिकित्सक वहाँ आ गए हालाँकि रात के ग्यारह बज रहे थे। सभी प्रयोग विफल रहे। चारों ओर नलियों में लव की नन्हीं जान अटकी थी।

डॉक्टर फर्ग्यूसन ने उसका कंधा थपथपाया! दुविधा में उनकी आँखों में आँसू थे। क्षोभ के, असफलता के, विवशता के। रवि उनकी छाती से लिपटकर फफक उठा।

”रो मत! ईश्वर ही इस सारे नाटक का रचयिता है मित्र! उसने इस मंच पर आज यह अपनी नई रचना भेजी थी। शायद इसलिए कि हम ऐसी अजीब रचना को समझ सकें और भविष्य में इससे सबक ले सकें। ’’

”सीख लिया डॉक्टर? क्या सीखा? उसकी माँ को सिखा पाओगे?’’ रवि हताश-सा पूछ बैठा।

”नहीं, पर जाने कितने और डॉक्टर उससे अनुभव ले सकेंगे अगर तुम चाहो तो।’’

”क्या मतलब?’’

”तुम चाहो तो तुम्हारा बच्चा अमर रहेगा। इसे बेजान हीरो बना डालो। इसे चिकित्साशास्त्र को उपहार दे दो। युगों-युगों तक अनेक विद्यार्थी तुम्हारे आभारी रहेंगे और यह मरकर भी जिंदा रहेगा। हमारे पास समय बहुत कम है। ’’ डॉक्टर फर्ग्यूसन उसके सामने एक फार्म रखकर चला गया, बहुत आत्म-मंथन के पश्चात उसके मन में उपकार की किरण फूटी। आशा से बात करना चाहता था, पर आशा होश में कहाँ थी जो कुछ पूछता या बताता। यह उसके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा थी। उस वक्त उसने कैसे लव की सभी नलियाँ उतारीं….उस फार्म पर हस्ताक्षर कर चुपचाप घर चला गया। यह वह भी नहीं जानता, गुनहगार हूँ आशा का। मैं भी तो उसी आग में जल रहा हूँ। आज तक न ही उस शून्य को भर पाया और न ही उसे प्रकट करने की हिम्मत ही जुटा पाया। कितनी आसानी से आशा उसे हृदयहीन करार देती है। उस दिन कैसे वह अपने हृदय और हाथों में खालीपन का एहसास लिये लौटा था। यही सोचते-सोचते न जाने कब उसकी आँख लग गई।

अगली सुबह कुश जल्दी ही वहाँ आ पहुँचा। तीनों समय से रिबन काटने के समारोह में उपस्थित हुए। इसके बाद एक वरिष्ठ प्रोफेसर उन्हें निर्देश देते हुए अंदर ले गए। चारों ओर शीशे को बड़ी-बड़ी अलमारियों में हड्डियों के मानव ढाँचे, फोरमेलीन में सुरक्षित मानव शरीर अत्यंत सफाई से दर्शनार्थ सजाए गए थे। प्रोफेसर का धीर गंभीर स्वर ऊँची छत वाले विशाल हॉल में गूँज रहा था।

”यह म्यूजियम है मानवता का। इसे मृत्युकक्ष न समझा जाए। यह मानवता के वह पुजारी हैं जिन्होंने सहर्ष अपना शरीर चिकित्सा शोध के लिए दान कर दिया। इन अवयवों को जो छोटी-छोटी शीशमहलों में सुरक्षित हैं। आप एक संपूर्ण नागरिक के रूप में पहचानें जिनके आप ही के जैसे माँ-बाप थे या शायद अभी भी हैं। जो रोते और हँसते थे, नाचते और गाते थे, खाते और पीते थे। अपनी मौत में भी यह अमर हैं और हम इनके तहेदिल से आभारी हैं क्योंकि प्रोफेसर आए और गए मगर यह वर्षों से आपके बच्चों को चिकित्सक बनाने में अपना अमूल्य सहयोग दे रहे हैं। ….कृपया उन्मुक्त मन से इन्हें अपनी श्रद्धांजलि दीजिए। ’’

तालियों की कर्णभेदी गड़गड़ाहट रवि को सुनाई नहीं पड़ी। वह अतीत में खोया इन्हीं शब्दों को वर्षों पीछे से सुन रहा था। यह नहीं हो सकता….कहाँ न्यू कासल कहाँ एडिनबरा….पच्चीस साल का अंतराल….प्रो. फर्ग्यूसन?

सहसा उसकी नज़र एक छोटे से जार पर अटक गई। मुश्किल से दो इंच का एक हृदय उसमें तैर रहा था अपने समस्त स्नायु संस्थान से चिपका। नीचे उसके जन्म की तारीख और बीमारी का नाम लिखा था, बस। यह भी लिखा था कि यह नन्हा बालक जन्म से ऐसा था और कुछ घंटे ही जीवित रह पाया।

यह देखते रवि सुन्न का सुन्न रह गया। उसका कलेजा धक-धक करने लगा। वह मन ही मन में गायत्री मंत्र का जाप करने लगा।

रवि ने देखा आशा तेजी से आगे बढ़ती जा रही थी। वह अचानक एक शीशी को देखकर ठिठकी….फिर आगे बढ़ गई। रवि की साँस में साँस आई। न जाने क्या सोच आशा पीछे मुड़ी और उसी शीशी के सामने जा खड़ी हुई जिस पर लिखा था 12.2.1989। तारीख देखते ही उसकी आँखें उस पर गड़ी की गड़ी रह गईं….पाँव वहीं जम गए….उसका सिर चकराने लगा….उसे धुँधला-धुँधला-सा दिखाई देने लगा। उसके मस्तिष्क में डॉक्टर के वही शब्द गूँजने लगे अनडेवेलप हार्ट….जो शीशी पर लिखा था। उसने अपनी आँखें मलकर फिर गौर से देखा….उसे कुछ क्षण दृष्टि स्थिर करने में लगे। आगे वह न पढ़ सकी। वह समझ नहीं पा रही थी कि वह थी या नहीं? यह होना न होना क्या होता है, उसने अपने को च्यूँटी काटी, उसकी ममता कराह रही थी। उसकी छातियाँ अकड़ने लगीं। उसके अतीत की सिसकियों की आवाज़ ऊँची हो गई। वह भूल गई थी कि वह कहाँ खड़ी थी। रो-रो कर वह उस शीशे के खरोंचती….ठोंकती….चूमती…. पुचकारती रही, बड़बड़ाती रही, ‘मेरे लाल….मेरे लाल….मेरे जिगर के टुकड़े….तू यहाँ?….क्यों….? तेरी यह हालत….कैसे?’ रवि और कुश ने उसे गिरते-गिरते बचा लिया। रवि उसे कमरे से बाहर ले गया। उसे समझाने की कोशिश करता रहा। आशा क्रोध से रवि को कालर से पकड़कर झिंझोड़ती बोलती जा रही थी, ”तुम तो कहते थे लव को वर्तमान से नहीं अतीत से संबोधित किया करो। वह देखो लव तुम्हारे सामने है मेरा बेटा….यहाँ कैसे….?….क्यों….क्या तुम नहीं जानते….मरकर भी आदमी मरता नहीं जब तक उसकी अंतिम चीज़ों को पूरा नहीं कर देते। यह देखो, लटक रहा है हमारा बेटा….न जियों में….न मरों में। ’’ उसका चेहरा कटुता से तमतमा रहा था।

रवि निःशब्द था। उसके गले में दोष भावना की गुठली ऐंठने लगी। वह नहीं जानता, आशा के बिलखते मन को कैसे शांत करे। रवि ने प्यार से आशा को गले लगाकर सहलाया। उसकी सिसकियाँ शांत होते ही बोला, ”गुनहगार हूँ तुम्हारा, तुम्हीं दोनों बेटों को प्रोफेसर बनाना चाहती थीं। देखो न, लव तो कुश से पहले ही प्रोफेसरों का प्रोफेसर बनकर कितने प्रोफेसर बना चुका है।’’

तीनों शांत थे। केवल रवि ही जानता था कि वह भी उसी आग में जलता रहता है। यह उसके जीवन का कठिन और कठोर फैसला था। लव का कोमल चेहरा अभी तक उसके भीतर चुभन-सी ला देता है। बाप तो वह भी है।

जाते-जाते आशा की नज़रों से आँख चुराकर उसने पीछे मुड़कर लव पर दृष्टि डाली, और बोला, ”आशा, सुनो तुमने….उसने तुम्हें पुकारा, ‘मम्मी। ’

--अरुणा सब्बरवाल

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