राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।

बरखा बहार (बाल-साहित्य )

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रचनाकार: भव्य सेठ

देखो भाई बरखा बहार
लेकर आई बूंदों की फुहार
रिमझिम-रिमझिम झड़ी लगाई
धरती कैसी है मुसकाई
लहराते पत्ते-पत्ते पर
हरियाली इसने बिखराई

ऋतुओं ने किया शृंगार
देखो आई बरखा बहार
झूम उठा मौसम चित्तचोर
नाच उठा जंगल में मोर
चमचम-चमचम बिजली बरसे
रिमझिम-रिमझिम बादल बरसे

गरज-गरज कर उमड़े बादल
अंबर पर छा गई है चादर
कौन आया है अपने देश?
माटी की सौंधी खुशबू से
धरती अंबर हुआ विभोर

छलका प्रकृति का है प्यार
देखो आई बरखा बहार
सूरज खेले आंख मिचौली
जब आए मेघों की टोली
उपवन हुआ बड़ा गुलजार
देखो देखो आई बरखा बहार

           --भव्य सेठ, न्यूज़ीलैंड

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