भाषा विचार की पोशाक है। - डॉ. जानसन।

अंझू (कथा-कहानी)

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Author: गुरबख्श सिंह

आंध्र में उगोल रेलवे स्टेशन के मुसाफिर खाने में बैठा गाडी की प्रतीक्षा में था। वेला सांझ की थी और दिसम्बर का सूरज सुनहले आकाश में से मुझे कमरे के द्वार में से प्लेटफार्म के पार दीख रहा था, जैसे रक्तिम कालीनों पर कोई छबीला साजन पग-पग उतर रहा हो। इधर मेरे कमरे में कोई सूरज, उभर भी तो रहा था। एक प्रेमी दम्पति एकांत छोर में बैठा अंग-अंग से मुस्करा रहा था। प्रकट में तो मैं बाहर के सूर्यास्त पर ही दृष्टि डाले बैठा था, किन्तु ध्यान मेरा अन्तरवर्ती सूर्योदय से ही जुड़ा हुआ था। अभी मेरी अन्तरात्मा से इस प्रीत नाटक की झलक के लिए कृतज्ञता की अनुभूति उभरी ही थी कि एक अनोखी मृदुल स्वर लहरी मेरे कानों में गूंज उठी। ऐसा लगा जैसे प्रेमी युगल की मौन भंगिमाएं संगीत में ढल गई हों।

किन्तु नहीं, वे तो निःशब्द एक-दूसरे के लोचनों में झांक रहे थे। वह स्वर-लहरी कहीं बाहर से सुनाई दी थी और उसमें मेरे लिए इस स्नेहिल क्रीड़ा से भी अधिक कोई आकर्षण था। मन-ही-मन उन स्नेहीजनों से आज्ञा लेकर मैं ध्वनित दिशा की ओर चल पड़ा, जैसे-जैसे निकटतर गया, स्वर लहरी एक थिरकता हुआ संगीत बनती गई।

तीसरे दर्जे के मुसाफिरखाने में कई लोग बैंचों पर बैठे थे, उन्हीं में से कोई गा रहा था, आवाज लड़की की तरह सुकोमल थी, लेकिन उस सारी भीड़ में लड़की कोई नहीं दिखाई देती थी।

दृष्टि गड़ा कर झांका, नौ एक वर्ष का एक लड़का नाच भी रहा था और गा भी रहा था। मेरी ओर उसकी पीठ थी, सिर पर लपेटी हुई मैली सी पगड़ी, से अनकटी लटें बाहर झूल रही थीं। वह कई बार सिर खुजलाता था, उसके कुर्ते के चीथड़े लटक रहे थे। पांव नंगे, टांगें खुजला-खुजलाकर खराशी हुई। उसके गले से एक ओर एलमीनियम का कंठदार पतीला एक रस्सी से लटक रहा था और वह उस पतीले पर बड़ी मस्ती से चुटकियाँ बजा रहा था। 

उसका मुंह मेरी ओर मुड़ा। चमकती-खनकती आवाज़, मैला-पीला मुखड़ा, उजली आँखें, परंतु ओंठों पर 
अमित मुसकान, हाथ-पैर और कंठ पर कमाल का अधिकार  कई बार वह अपने को खुजलाता किन्तु न पांवों का ताल टूटता, न ही चुटकी का।

और गीतों का भी कोई भंडार था उस के पास। एक समाप्त होता तो श्रोता किसी नए गीत की मांग कर उठते। हर धुन के साथ वह चरणों को नई लय में उठाता। मैं उसकी भाषा का एक शब्द भी नहीं समझता था, लेकिन अनुभव कर रहा था कि उसके गायन में सस्ती फिल्मी धुनें नहीं थी, भक्ति संगीत को उसमें पवित्रता थी, अमर सत्य-स्नेह की तरह उसमें आराधना थी।

मेरी जिज्ञासा भरी व्याकुलता भांप कर एक अंग्रेजी भाषी यात्री मेरे पास आ बैठा, उसने मुझे एक गीत का आशय समझाया--

नदी के घाट पर 
तरु की ओट से 
सांवरिया मटकते निकले
और गोरी की गगरिया से
उसके अधर अधिक छलके। 

मैंने पूछा--यह लड़का शौक से गाता है, या मांगने के लिए? 

-मांगने के लिए।

और कई गाने गा कर वह बैठ गया। कुछ देर खांस के और फिर निराले ढंग से मुस्करा कर उसने हाथ बढ़ाया। अत्यन्त सरल, अतीव भोली थी उसकी मुसकान, किन्तु वह मुसकानों वाली मुस्कराहट नहीं थी, उसमें सुनने वालों की कृतज्ञता पर एक व्यंग्य था।

एक-एक कर के सब ओर से आठ-दस पैसे मिले, उसने उठ के किसी के पास जा कर दीनतापूर्वक नहीं मांगा। मैंने अपने साथी को एक रुपया देकर कहा--अगर वह लड़का अपनी कहानी, जितनी वह सुना सकता है। सुना दे ......।  

रुपया उसने ले लिया, लेकिन कृतज्ञता के नाते उसका कोई अंग न हिला और मेरे साथी के इशारे पर वह मेरे पास आ गया।

मेरा नाम अंझू है--मेरी उम्र ग्यारह बरस की है, मेरा पिता बूढ़ा है। मां बूढ़ी नहीं, दुर्बल है, पतली है, बहुत भली है--मेरा पिता रस्सी बटता है, रुपया, डेढ़ रुपया कमा लेता है। मैं भी चार-आठ आने मांग लेता हूं। 

मैंने पूछा--तुमने गाना किससे सीखा?

वह सहसा खिलखिला पड़ा-मेरा गाना, हवा का गाना है। मैंने किसी से नहीं सीखा। मंदिरों में लोग गाते हैं, पाठशालाओं में बच्चे गाते हैं, बाजारों में सिनेमावाले रिकार्ड बजाते फिरते हैं--- मुझसे जब पिता जी का काम नहीं होता, मैं इन्हीं स्थानों पर घूमता रहता हूं... 

मैंने पूछा--घर में तुम्हारा गाना कभी कोई सुनता है?

--पहले तो पिता जी क्रोध किया करते थे, पीटते भी थे कि क्या 'टुन-टुन लगाए रहते हो, चलो मेरे साथ काम करो। फिर मुझे धोरे-धीरे कुछ मिलने लगा, मैं एकाध आने का कुछ खाकर बाकी उन्हें ला देता हूं। अब वह क्रोध में नहीं आते, परन्तु वह मेरा गाना सुनते नहीं हैं। मां कभी-कभार जब घर के कामों से जल्दी निवृत्त हो जाए, तो कहा करती है--गाडूजा वही 'नदी घाट ऊपर गागरिया' वाला गाना सुना। मेरे मातापिता की झोंपड़ी नदी किनारे थी। दो बहनें भी हैं परन्तु छोटी हैं। मैने सिला कर कपड़े कभी नहीं पहने, पुराने उतारे हुए ही कोई दे देता है। कई बार मेरे लिए खाने को कुछ नहीं बचता। कई बार कोई देता है। कई बार कोई कितनी ही देर मुझे गवा लेता है। उस दिन मैं मां के सामने गा-नाच कर सो जाता हूँ।    ... गा कर, मेरी भूख उतर जाती है। बीमार मैं ज्यादा नहीं होता, भगवान राजी कर देता है। दवाई मैंने कभी नहीं खाई है। बीमारी में मुझे कई धुनें सूझती हैं, उस समय भगवान मुझे सोए में सिखाता है। मुझे स्वप्न बहुत आते हैं, उसमें डूब कर मैं बहुत सुरीला गाता हूँ, मुझे बहुत लोग सुनते हैं, रुपयों की वर्षा हो जाती है। रुपये मेरे पाँवों तले खनकते हैं, मेरे टखने रुपयों से ढक जाते हैं। ऐसे में मझसे नाचा नहीं जाता और सपने बिखर जाते हैं । नीचे भूसे की ढेरी में मेरी टांगें फंसी होती हैं, मैं फिर आंखें मींच लेता हूं। शायद कहीं फिर कोई सपना मुझे अपने में समेट ले।

जिन्होंने सुना, वे हँस दिए । अंझू गाडू नहीं हँस रहा था और न मुझे ही हँसी आई। मैं उसे शुभकामनाएँ प्रदान कर के प्लेटफार्म पर आ गया, कमरे में नहीं गया। वह स्नेह-क्रीड़ा मुझे भूल गई थी। मैले पांवों की थाप, खाली बर्तन पर बजती हुई चुटकियां, पीले-पीले ओंठों से बिखर रहे लाल-लाल बोलों से मेरे पांव मचल रहे थे, मेरे कान बज रहे थे। काश! मुझे उस गाड़ी पर न चढ़ना होता। मैं उसके घर जा कर ढूँढना चाहता था कि चट्टान जैसी खुरदरी उसकी पारिवारिक जिन्दगी में कौनसी वह दरार थी, जहां से वह सुकोमल सी कोंपल फूट निकली। किन्तु दूर पर गाडी का सिगनल गिर गया। मैं प्लेटफार्म के परले एकान्त सिरे पर पहुंच गया था। उस एकान्त में भटकता रहा । एक ओर ज़मीन पर एक महिला लेटी हुई थी, उसने अपनी धोती पांवों से गले तक खींच रखी थी। उसका मुखड़ा जवान, किन्तु बहुत निर्बल था। उसके साल भर के शिशु ने धोती में से उसका एक स्तन बाहर निकाला हुआ था --वह उसे पीता कम-- उससे खेलता अधिक था। स्तन में से दूध ज्यादा न आता होगा, परन्तु वह खुश था--अपनी माँ से बलिष्ठ था-माँ अपनी निर्बल मुसकान के साथ उसकी क्रीड़ाओं का हुंकारा भरती जाती थी।

अंझू गाडू की माँ का काल्पनिक चित्र मेरे सामने आ गया। मैं घूमता रहा--मेरी झुकी आँखें उस बालक पर टिकी रहतीं, हर चक्कर के बाद वह बालक मुझे युवा दिखाई देता और जब गाड़ी की सीटी सुन कर मैं अन्तिम चक्कर काटकर स्टेशन की ओर मुड़ा, तो वह मुझे अंझू गाडू जितना बड़ा दिखाई दिया। और चार कदम आगे जाकर क्या देखता हूँ कि अंझू गाडू मेरी राह में खड़ा था और उसके साथ एक साथी था।

अब मुझे अंझू गाडू पहले से भी भला प्रतीत हुआ। उसकी आँखों में उस कृतज्ञता का बिम्ब भी था, जो पहले न पा कर उसकी लापरवाही पर मैं आश्चर्यचकित था। उसका साथी केवल उसकी बात समझाने के लिए आया था, उसके हर अंग में कुछ कह डालने की विकलता व्याप्त थी। मैंने उसके कंधों पर हाथ फेर कर उसके साथी से पूछा---अंझू गाडू क्या कहना चाहता है।

--आपसे विदा मांगने आया है। कहता है, उस समय वह कुछ कह ही नहीं पाया।

मैंने हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ाया, किन्तु उसने जवाब में अपने हाथ जोड़ दिए। उसकी पीठ पर मैंने थपकी दी और उसे बताया कि अपनी सारी आयु में मैंने उस जैसा गाना किसी से नहीं सुना।

जब उसके साथी ने मेरी बात का अनुवाद करके उसे बताया तो उसने मेरी ओर आँखें उठाकर देखा। वे आँखें क्षण भर के लिए उतनी उजली नहीं रह गई थीं। जागृति में भी उसने अपना प्यारा स्वप्न निहार लिया था।

विदा मांगने वह आया था किन्तु विदा मैंने मांग ली। वह जैसे भूसे में पांव फंसाए वहीं खड़ा था। मैं अपना डिब्बा ढूंढ कर उसमें जा बैठा। अभी अपने मन समाए, अंझ गाडू से बातें करने के लिए आँखें मीचने ही लगा था कि अंझू गाडू मेरे वाले डिब्बे का हेंडिल घुमा रहा था। मैंने पूछा कि क्या वह भी उसी गाड़ी में जाने वाला है। मैं प्रसन्न था कि वह भी उसी गाड़ी में जाएगा, उसकी टिकट का शेष किराया मैं दे दूंगा।

परन्तु उसके साथी ने बताया अंझू चाहता है कि मैं उसे साथ ही ले जाऊं, अपने शहर अपने गांव, अपने घर। वह मुझे गाने सुनाएगा, वह मेरे बच्चों को गाना सिखाएगा, वह मेरे शिशुओं के लिए नाचा करेगा। वह तो घुंघरुओं के साथ और भी अच्छा नाचता है।

मैंने अंझू को और भी समीप से देखा। वह सचमुच एक द्रवित सी आत्मा थी। शरीर तो पहले भी उसका विशाल नहीं था, ग्यारह वर्ष का भी वह नौ का सा ही दिखाई देता था, किन्तु उस समय वह सचमुच अपने गीत की लय बन गया था। बांस की पतली सी पोंगली की भांति, जिसके छिद्रों से निकली हुई स्वर लहरी, दूर-दूर जाने वालों को भी स्तंभित कर देती, जो काम में उलझे हुए हाथों को बांध कर रख देती है। निःशब्द संदेश देते हए उसके नैनों में झांक रहा था मैं और उसके गाए-अनगाए सभी गीत मेरी आत्मा में समा रहे थे।

क्षण भर के लिए मेरा हाथ, दरवाजे के हैडिल की ओर बढ़ गया। जी में आया,  दरवाजा खोल कर अंझू को गाड़ी में बैठा लूँ
उसके धुले हुए पांवों से न जाने कैसा नृत्य फूटेगा, माप में सिले हुए कुर्ते में कैसा फबेगा। गीतों जैसे उसके बारीक नक्श एक ही दिलासे के साथ चमक उठे थे और जी भर खाई खुराक से वही रूप-रंग कैसा छविमान हो उठेगा।

किन्तु हैडिल घुमाने के स्थान पर मैंने अपना हाथ उसके मुँह पर फेर दिया।  वह हाथ उसने पकड़ लिया। मैंने अपने दूसरे हाथ से उसका हाथ दबाया, मेरे भीतर कुछ अनुभूति हुई।

तू कहानी है गाडुया, मैं कहानीकार। हमारे देशवासी अपने भाग्य के साथ संघर्ष कर रहे हैं, इसलिए तुम्हारे गीतों और मेरी कहानियों को उनकी विजय की राह देखनी पड़ेगी। मेरी बारीक दृष्टियों से तू ओझल हो गया है,  हाँ तू और मैं निकटतम सम्बन्धी हैं। तूने चीथड़ों में और मैंने सिले कपड़ों में अपनी कला का मोल आंकने के लिए टक्करें मारी हैं। तुम्हारी अभी आरम्भ हुई है, और समाप्त अभी मेरी भी नहीं हुई।

उसका साथी न जाने उसे मेरी बात भली-भांति समझा भी सका या नहीं, किन्तु वह बिना सिखाए गीत गाने वाला, नि:शब्द भावों को भी समझ सकता था। उसके लोचनों की चितवन और उसके हाथों की घुटन मझे उत्तर दे रही थी और मैं उसे कह रहा था--तुझे मैं अपने साथ तो नहीं लिए जा रहा, परन्तु तुझे याद हमेशा रखूँगा। तेरे बूढ़े पिता को तेरी अच्छी माँ को, उसके मैके में बहती नदी को, तेरे पवन के गीतों को, तेरे भगवान को, जो स्वप्नों में तेरे लिए रुपयों की वर्षा करता है।

गाड़ी चल पड़ी थी, अंझू गाडू साथ-ही-साथ चला आ रहा था। मैंने स्थिति भांप कर शीघ्रता से उसका हाथ छोड़
दिया ···  मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूगा, अंझू गाडुआ! 

वह देख रहा था। वह देखता ही रहा। और फिर नजरों से ओझन हो गया। किन्तु गाड़ी में मेरी सारी यात्रा के साथ वह मेरे लिए गाता रह ... . .गाता रहा . . . . ।

-गुरबख्श सिंह
[कथा भारती] 

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