हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।

उदयेश्वर नीलकंठेश्वर (विविध)

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Author: डॉ प्रियंका जैन

उदयपुर का नाम लें और दिमाग में आता है - राजस्थान राज्य के मेवाड़ क्षेत्र में झीलों का शहर - उदयपुर!

न, न, ये वो नहीं है! मैं बात कर रही हूँ, अपने मूल निवास स्थान 'गंज बासौदा' शहर की जो कि मध्य प्रदेश के जिला विदिशा के सम्राट अशोक के साँची स्तूप के निकट है। इस शहर के बाहरी इलाके में लगभग 12 किलोमीटर दूर एक बहुत ही सुंदर ऐतिहासिक मंदिर और उसके आसपास के कई छोटे-छोटे मंदिर हैं और यह अज्ञात व अनूठी जगह का नाम है - "उदयपुर"।

उदयेश्वर नीलकंठेश्वर

यह उदयपुर एक प्राचीन पूर्व मुखी शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है, जिसकी वास्तुकला इतनी अनोखी है कि सूर्य की पहली किरण वर्ष में दो बार मंदिर के मुख्य देवता'भगवान उदयेश्वर नीलकंठेश्वर' पर पड़ती है। उस समय, जब गणित ज्योतिष में विषुवों के आसपास सूर्य विषुवत् रेखा पर पहुँचता है तथा दिन और रात दोनों बराबर होते हैं।

यह मंदिर 11वीं शताब्दी में राजा उदयादित्य द्वारा बनाया गया था। राजा उदयादित्य परमार वंश के महान राजा भोज के पुत्र और शहर भोजपाल यानी भोपाल के संस्थापक थे। कहा जाता है कि पुष्य नक्षत्र में हर महीने का एक दिन इस मंदिर के निर्माण के लिए निर्धारित किया गया था। 26 दिनों तक नक्काशी और अन्य सामग्री तैयार होने के बाद, मंदिर की वास्तविक इमारत 27वें दिन केवल 24 घंटे की अवधि में होती थी।

यह आकर्षक कहानी पूरी होती है शिखर के शीर्ष के पास पत्थर में एक मानव आकृति के साथ। ऐसा कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण कार्य पूरा होने के बाद 'कलशारोहण' के लिए एक शिल्पकार ऊपर गया और उसने कलश स्थापित किया। स्वयं की कलाकृति को निहारते हुए, वह अभिभूत शिल्पी कुछ क्षणों के लिए हतप्रभ रह गया। इसी वक्त सूर्य उदय हो गया और वह कलाकार पत्थर में परिवर्तित हो गया, अनंत काल के लिए अपनी कला और देवता को समर्पित।

इतना ही नहीं¸ इस मुख्य मंदिर के बाहृ परिदृश्य में भगवान शिव का नटराज रूप, नारी रूप भगवान गणपति, सूर्य देव, नक्काशीदार चामुंडा माता, देवी सरस्वती, अर्धनारेश्वर (एक शरीर में नर और मादा रूपों का प्रतीक) और विभिन्न नृत्य मुद्राओं के साथ रूपजटिल नक्काशीदार स्तंभ भी हैं। आस पास बिखरी हुई शिलाओं पर कुछ अधूरे रेखा चित्र (ब्लू प्रिंट) जैसे कि आज भी इंतज़ार कर रहे हैं मंदिर के किसी भाग में अंतिम रूप दिए जाने का।

यह सांस्कृतिक धरोहर पूर्ण रूप से सुरक्षित है और अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है। यह जगह भारतीय संस्कृति का एक छिपा रत्न है जिसे देखे बगैर छोड़ा नहीं जा सकता।

स्वागत है मेरे घर 'गंज बासौदा' में ...मेरा मूल निवास... मेरा गर्व!

-डॉ प्रियंका जैन
 सह निदेशक
 कृत्रिम मेधा समूह
 सी-डैक, देहली
 ईमेल : priyankaj@cdac.in

 

डॉ प्रियंका जैन

*डॉ प्रियंका जैन 'कृत्रिम मेधा' पर काम करती हैं और सी-डैक में सह निदेशक हैं लेकिन इनकी हिंदी लेखन में विशेष रूचि है। 

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