समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है। - (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर

अनीता बरार द्वारा लिखित 'क्रॉसिंग द लाइन' पुरस्कृत (विविध)

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Author: भारत-दर्शन समाचार

अनीता बरार द्वारा लिखित और निर्देशित डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'क्रॉसिंग द लाइन' को मुंबई, भारत में याथा कथा अंतरराष्ट्रीय फिल्म और साहित्य उत्सव 2021 में विशेष पुरस्कार मिला है।

यह फिल्म 25 नवंबर 2021 को इस फिल्म फेस्टिवल के विशेष खंड ‘अमृतमहोत्सव'  - भारत की स्वतंत्रता के 75वें वर्ष समारोह' में प्रदर्शित की गई थी।

इस फिल्म का 2007 में सिडनी में, जाने माने ऑस्ट्रेलियन गायक कमालह के द्वारा प्रीमियर हुआ था। इस फिल्म को दुनिया भर के विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में मान्यता मिली है। और इसे ICAS एडिलेड और चियांग माई थाईलैंड ( ICAS  - एशियाई विद्वानों के लिए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन)  में भी प्रदर्शित किया गया है। 
2018 में बिमटेक इंडिया ने भी इस फिल्म की स्क्रीनिंग और इसे सम्मानित किया। 

फिल्म के बारे में लेखिका का वक्तव्य 

मेरा जन्म स्वतंत्र भारत में हुआ था। मेरे लिए 1947 में भारत के विभाजन के समय जो कुछ भी हुआ वह या तो इतिहास की किताबों में था या मेरे माता-पिता की साझा स्मृति में। मेरे पिता अक्सर अपने दोस्त हुसैन को याद करते थे, जिन्हें उन्होंने दादू में अपने घर की चाबियां सौंप दी थीं, इस उम्मीद के साथ कि वे जल्द ही वहां लौट आएंगे।

विषय चाहे जो भी हो, मेरे माता-पिता की बातचीत अक्सर 'विभाजन से पहले' उपसर्ग के साथ शुरू होती थी। मेरी माँ को तेज़ आवाज़ और भीड़-भाड़ वाली जगह में असुरक्षा की भावना पैदा हो जाती थी। उम्र के साथ साथ, माँ-पिताजी के मन में एक बार फिर अपना घर खोने का डर समाया रहता था।  

उनकी बातों में  विभाजन के समय की न केवल नुकसान, दुश्मनी, हिंसा की मुझे आश्चर्य होता था कि बिना युद्ध किए लाखों लोग कैसे मारे गए, अपहरण किए गए या अपनी जड़ों से ही उखड़ गए। 

मुझे हैरानी होती थी कि धर्म, जो हमें सुरक्षा और आंतरिक शांति देता है, वह भी सीमाओं, रक्तपात और असुरक्षा का कारण बन सकता है!  तभी से भारत का विभाजन मेरे लिए एक जिज्ञासु भावना का विषय बन गया। 

जब मैं 1989 में सिडनी आयी, तो मैंने देखा कि भारत और पाकिस्तान के लोग बड़े ही मेलभाव से रहते हैं। कहीं कोई मन मुटाव नहीं। मैं  जानना चाहती थी कि कभी जो लोग एक सांप्रदायिक दरार का सामना करते हुये अपनी जड़ों से उखड़ गए थे और अब खुद को उन भौगोलिक सीमाओं से दूर एक-दूसरे के पास पाते हैं, वे अब कैसा महसूस करते हैं? क्या वह पीड़ा, वह घाव अब भी ताजा हैं?

मेरी जिज्ञासा को इस मंजिल तक पहुँचाया सिडनी में एक कला संगठन ने। ऑस्ट्रेलियन कला परिषद और कला मंत्रालय द्वारा समर्थित, इस कला संगठन ICE ने इस फिल्म के लिए कुछ वित्तीय सहायता और उपकरण प्रदान किए। 

इस फिल्म में सामान्य शुरुआती अड़चनें थीं। बजट बहुत सीमित था। सब कुछ जैसे कैमरामैन की फीस, एडीटिंग, संगीत आदि सद्भावना के रूप में ही आया।

सौभाग्य से, अपनी शुरुआती चिंताओं और झिझक के बाद, फिल्म में भाग लेने वाले सभी लोगों ने न केवल इसका पूरा समर्थन किया बल्कि इसकी सफलता के लिए प्रार्थना भी की। वे जानते थे कि विभाजन एक राजनीतिक स्थिति थी और उन्हें एक-दूसरे (भारतीय और पाकिस्तानी) से कोई दुश्मनी नहीं थी। फिल्म के एक उद्धरण के अनुसार, “हर कोई दिल का अच्छा होता है। बस वो समय था जब कुछ अच्छे लोग भी बुरे हो गए थे।"

इस फिल्म को बनाना न केवल एक प्रेरक अनुभव था, बल्कि यह एक बड़ी सीख भी थी। इस फिल्म ने एक तरह से मुझे अपनेपन का और नजदीकियों का खास एहसास दिया।

इस फिल्म की कहानी से पता चलता है कि कैसे किसी ने अतीत की विशिष्ट सीमाओं के भीतर वर्तमान को व्यवस्थित किया है।  इसकी हर घटना अपनी जड़ों को तलाशने की लालसा लिए हुए है। पहली बार, मैंने अपने माता-पिता की खामोश लालसा और उनके द्वारा बार-बार इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों - 'विभाजन से पहले' को पूरी तरह से समझा।

इस फिल्म में, मैंने अपने दिवंगत पिता की ऐतिहासिक तस्वीरों के व्यक्तिगत संग्रह और कुछ रेखाचित्रों का उपयोग किया है। मुझे याद है, उन्होंने 1985 में मुझे अपना संग्रह दिया था। फिर 1989 की शुरुआत में उनका निधन हो गया।

शायद मेरे पिता ने कहीं यह जान लिया था कि एक दिन मुझे उन ऐतिहासिक तथ्यों की आवश्यकता होगी। वास्तव में, यह एक आशीर्वाद और एक दैवीय सहायता थी। फिल्म में चित्रण के लिए, मैंने हिंदी फिल्म - सरदार और पिंजर से कुछ सेकंड के दृष्यों का इस्तेमाल किया है। इसके लिये मैं सरदार पटेल ट्रस्ट, भारत, शिमारू वीडियो और इरोज ऑस्ट्रेलिया के सहयोग के लिए उन्हें धन्यवाद देती हूँ।

यह फिल्म मेरे दिवंगत माता-पिता को समर्पित है, जो नवंबर 1947 में दादू (पाकिस्तान) से भारत आये और सीमा रेखा के दूसरी तरफ अपने दोस्तों से मिलने की उनकी इच्छा अधूरी रह गई …

[ अनीता बरार के कथ्य से]

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