राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार
कलियुग का एकलव्य (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:रोहित कुमार 'हैप्पी'

'नमस्ते, मास्टरजी!' गली से निकलती उस लड़की को देख एक मनचले ने फबती कसी। लड़की बेचारी आँखे नीचे किए तेज़ क़दमों से वहाँ से निकल गई।

वह लड़की स्थानीय विद्यालय के एक अध्यापक की बेटी थी। 'मास्टजी, नमस्ते' का संबोधन करने वाला यह 'कलियुग का एकलव्य' भी उसी विद्यालय का छात्र था।

- रोहित कुमार 'हैप्पी'

 

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