राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार
हिंदी | लघु-कथा (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:रोहित कुमार 'हैप्पी'

हिंदी का एक साहित्य-सम्मेलन चल रहा था। सम्मेलन जहाँ आयोजित किया गया था उस भवन के प्रांगण में मेज़ पर एक पंजीकरण-पुस्तिका रखी थी। सम्मेलन में सम्मिलित होने वाले सभी साहित्यकारों को इस पुस्तिका में हस्ताक्षर करने थे।

मैं भी पंक्ति में खड़ा था। अपनी बारी आने पर मैं हस्ताक्षर करने लगा तो पुस्तिका में दर्ज सैकड़ों हिंदी कवियों, लेखकों व साहित्यकारों के हस्ताक्षरों पर मेरी दृष्टि पड़ी - कहीं एक-आध हस्ताक्षर ही हिंदी में दिखाई दिया। हिंदी में रचना करने वाले कवियों, लेखकों व साहित्यकारों का यह कर्म मेरी समझ से परे था। हिंदी का साहित्य-सम्मेलन !

-रोहित कुमार 'हैप्पी'

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