राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार
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Author:रोहित कुमार 'हैप्पी'

उस शानदार महल की दीवारों पर लगे सफेद चमकीले पत्थरों का सौंदर्य देखते ही बनता था। दर्शक उन पत्थरों की सराहना किए बिना न रह सकते थे। सुंदर चमकीले पत्थर लोगों से अपनी प्रशंसा सुन फूले न समाते थे।

आलीशान महल की दीवारों पर लगे शानदार पत्थरों ने एक दिन नींव के पत्थरों से कहा, "तुम्हें कौन जानता है? हमें देखो, हमें कितनी सराहना मिलती है?'

नींव के पत्थरों ने झुंझलाकर थोड़े अशांत मन से उत्तर दिया, "हमें शांत पड़े रहने दो! शांति भंग मत करो।"

नींव के पत्थरों की झुंझलाहट और थोड़ी-सी अशांति के फलस्वरूप महल की कई दीवारें हिल गईं और उनमें लगे कई आत्म-मुग्ध सुंदर पत्थर अब जमीन पर गिर धूल चाट रहे थे।

- रोहित कुमार 'हैप्पी'

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