कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती। - सैयद अमीर अली 'मीर'।
उपकार का बदला (बाल-साहित्य )  Click to print this content  
Author:देश-दुनिया की बाल कथाएँ

एक लकड़हारा था। उसका नाम था रामधन। एक दिन जंगल में लकड़ी काटने गया। उसे किसी के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी, "बचाओ! बचाओ!" उसने इधर-उधर देखा तो पता लगा, आवाज एक कुएँ से आ रही है। उसके अन्दर झाँककर देखा, उसमें एक बाघ, एक साँप, एक बन्दर और एक मनुष्य दिखाई दिए।

बाघ बोला, "अरे भले आदमी, मुझे बचा लो। मैं तुम्हें कोई कष्ट नहीं दूंगा।" रामधन ने उस पर विश्वास कर एक रस्सी लटकाई और उसे बाहर निकाल लिया।

फिर रामधन ने बन्दर को भी बचा लिया। बन्दर बोला, "मैं नदी के पास वाले बड़े पेड़ पर रहता हूँ। मुझे कभी-कभी दर्शन दिया करें।"

रामधन ने फिर साँप को भी बचा लिया। साँप ने कहा, "मैं राजमहल के बाग में रहता हूँ। जब कभी आपको मेरी सेवा की आवश्यकता हो मुझे याद करें। मैं नहीं चूकूँगा।"

अन्त में, मनुष्य को भी बाहर लाने में सफलता मिली। वह एक सुनार था। सुनार ने अपना परिचय देते हुए बोला, "मैं राजधानी का प्रसिद्ध सुनार हूँ। जब कभी मेरी जरूरत पड़े, मैं आ जाऊँगा। मैं हीरे-जवाहरात, सोने-चाँदी का व्यापार करता हूँ। कभी कुछ खरीदना या बेचना हो तो मेरी सेवा का लाभ उठा लेना।"

कुछ दिन बाद रामधन का फिर जंगल में जाना हुआ। उसे प्यास लगी। वह पास बहती नदी में पानी पीने गया। जब वह पानी पी रहा था, उसने किसी को यह कहते सुना कि मेरे प्राण बचाए जाने के एवज में इसके लिए कुछ-न-कुछ करूंगा।

वह बन्दर था। उसने कुछ फल लाकर दिए और कहा, "आप निःसंकोच खाइए।" इसके बाद फिर बन्दर उसे बाघ के यहाँ ले गया। बाघ ने कुछ सोने के आभूषण रामधन को दिए। रामधन ने पूछा, "ये कैसे आए?"

उसने कहा, "एक दिन एक राजकुमार यहाँ शिकार खेलने आया। उसने मुझ पर बाण चलाया, पर मैं बच गया। और हाँ, मैंने राजकुमार को मार डाला। उसके शरीर को खा गया। ये गहने उसी के हैं। आपने मेरे प्राण बचाए थे। इन्हें ले लें। मेरे तो वे किसी काम के हैं नहीं।'

रामधन ने गहने ले लिये और उन्हें सुनार के पास ले गया। सुनार ने देखकर कहा, "ये गहने तो राजकुमार के हैं। इन्हें राजा को दे दें, वह प्रसन्न होंगे।"

राजा ने गहने देखे तो कहा, "ठीक है, पर ये गहने जिसने दिए हैं, उसे पकड़कर मेरे पास लाओ। इसी आदमी ने मेरे पुत्र को मारकर गहने छीने होंगे।"

बेचारा रामधन पकड़ा गया और कैदखाने में डाल दिया गया। साँप ने देखा कि यह वही आदमी है, जिसने मुझे बचाया था। उसके मन में इसकी सहायता करने की इच्छा जागी। साँप रामधन की कोठरी में गया और कहा, "यह दवा लो। यह साँप के विष को नष्ट करने की दवा है। काम आएगी।"

एक-दो दिन बाद रानी बाग में सैर करने आई। उसे देखकर साँप ने उसे डस लिया और रानी मरने जैसी हो गई। राजा घबराया। उसने ढिंढोरा पिटवाया कि अगर कोई रानी को बचा लेगा तो उसे बहुत-सा इनाम दिया जाएगा। रामधन ने जेल के अधिकारियों द्वारा सूचना दी कि वह साँप के काटे का विष उतार सकता है।

राजाज्ञा से उसे बुलाया गया और उसके इलाज से रानी स्वस्थ हो गई राजा बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने रामधन का मृत्युदण्ड माफ कर दिया और उसे इनाम देकर विदा कर दिया।

सम्पादन : सौम्या सरकार
[देश-दुनिया की बाल कथाएँ]

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