राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार
आदमी कहीं का (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:रोहित कुमार ‘हैप्पी'

Adami Kahi Ka

'भौं...भौ...' की आवाज से मेरी तंद्रा टूटी। 

आज काम में ऐसा व्यस्त हुआ कि ना अपनी सुध रही और न उन दो पिल्लों की, जिनके खान-पान का दायित्व कुछ दिनों के लिए मेरी पड़ोसन मुझे सौंप गई थी। मैं जल्दी से उठा और दोनों पिल्लों के लिए अंदर से उनका खाना ले आया। 

मैंने दोनों को पुचकारते हुए, उनका खाना डाल दिया। वे दोनों पूँछ हिलाते हुए जल्दी-जल्दी खाने लगे। एक पिल्ले ने बड़ी शीघ्रता से अपने सब बिस्कुट खा लिए और लपक कर दूसरे का भी एक बिस्कुट खा लिया। दूसरा पिल्ला उसके इस व्यवहार पर बुरी तरह गुर्राया, मानो कह रहा हो, 'आदमी कहीं का!' 


रोहित कुमार ‘हैप्पी'
न्यूज़ीलैंड

Previous Page  |  Index Page  |   Next Page
 
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें


Deprecated: Directive 'allow_url_include' is deprecated in Unknown on line 0