देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

विचित्र विवशता | कविता (काव्य)

मधुप पांडेयमधुप पांडेय

‘उधर प्रशासन को
चुस्त बनाने के
अथक प्रयास हो रहे हैं
और इधर आप
टेबल पर सिर रखकर
आराम से सो रहे हैं!'

उत्तर मिला--
‘अब आप ही बताएं!
ऑफिस में ‘तकिया'
कहां से लाएं?'

इस शृंखला की अन्य रचनाएँ (Other articles in this series)

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।