एक शेर जंगल में अपने पंजों पर अपना भारी भरकम सिर टिकाए आराम कर रहा था। अचानक एक चूहा उसके ऊपर आ कर गिरा और डरकर शेर के मुख की और भागने लगा। शेर को बहुत गुस्सा आया। उसने चूहे को अपने पंजों में जकड लिया और कहा, "तेरी यह हिम्मत? मैं अभी तुझे खा सकता हूँ।"
चूहा डर के मरे कांपता हुआ, जीवनदान मांगें लगा, "शेर महाराज , मुझे क्षमा कर दो, गलती हो गयी। अगर आप मुझे जाने देंगे तो मैं अवश्य कभी आपके काम आऊँगा।"
'मेरे काम आओगे?" शेर को एक बार तो और अधिक गुस्सा आ गया पर उस डरे हुए चूहे को देखकर शेर को दया आ गई, बोला, "तुम इतने छोटे हो, तुम मेरी क्या मदद करोगे। अच्छा, जाओ।" शेर ने चूहे पर दया कर उसे छोड़ दिया।
कुछ दिनों बाद अपने शिकार को ढूंढते हुए शेर एक शिकारी के जाल में जा फंसा। चूहे ने दूर से शेर को जोर-जोर से दहाढ़ते सुना और वह चूहा शेर की गर्जना से उसे पहचान गया। उसे शेर की दयालुता याद थी। वह भागकर शेर के पास जा पंहुचा। उसने देखा कि शेर जाल में फंसा हुआ छटपटा रहा है।
उसने शेर के समीप जाकर कहा, "महाराज, आप चिंता न करें। मैं एक ही पल मैं आपको इस जाल से मुक्त कर दूंगा।" चूहे ने झटपट अपने नुकीले दाँतों से जाल को कुतर डाला।
अगले पल शेर उस जाल से मुक्त हो गया। शेर की आँखों में पानी आ गया। उसने चूहे को गले लगाकर, धन्यवाद दिया। फिर वे दोनों शिकारी के आने से पहले वहाँ से चले गए।
सीख: दयालुता कभी व्यर्थ नहीं जाती।
अनुवाद: रोहित कुमार 'हैप्पी'
[ईसप की कथाएँ ]
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