जो सच था, सपना हुआ,
बाकी है अभिलाष।
कैसे मानूं, रे समय,
तू लौट आएगा पास।।
आंसू बनकर उड़ गई
आंखों से तुम आज।
मुक्ता बन इन सीपियों,
को तर करना गिरिराज।।
ज्ञान,भक्ति में, मैं नौसिखिया,
अपनी कृपा बढ़ा देना।
यदि मैं तुम तक पहुंच न पाऊं,
तुम मेरे तक आ जाना।।
-क्षेत्रपाल शर्मा
19/17, शांतिपुरम,
सासनी गेट, अलीगढ़ (भारत)
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