अक्टूबर 1938 के 'हंस' (संपादक: श्रीपत राय) के पृ. 94-95 पर नित्यानंद की यह रचना, जो 'विशाल भारत' (सितंबर 1938) से ली गई है, भूमिका में दोनों जगह 'लघु-कथा' (हाइफ़न सहित) कही गई है, 'लघुकथा' नहीं। उस समय यह शब्द प्रायः 'छोटी कहानी' के अर्थ में चलता था, आज की विधा-संज्ञा 'लघुकथा' के अर्थ में नहीं, यह हमारा अनुमान है। रचना में भी कई चरण, लंबा कालखंड और रूपकात्मक विस्तार है ('कितने देश पीछे छूट गए, कितने लोक लाँघ डाले'), जो आज की कसी हुई लघुकथा से अलग है। इसलिए इसे 'लघु-कथा' कहना इसके स्वरूप के अनुकूल भी लगता है। बाक़ी विद्वान जानकार इस पर प्रकाश डालें।
श्री नित्यानंद की एक सुन्दर लघु-कथा सितंबर, 1938 के 'विशाल भारत' में प्रकाशित हुई है। इस लघु-कथा को सम्पूर्ण ही पाठकों के मनोरंजनार्थ यहाँ उपस्थित करते हैं [यह टिप्पणी 'हंस' के अक्टूबर 1938 में प्रकाशित है] —
'कवि और ज्ञानी, दोनों ही चले—उस छिपे धन की खोज में। उन्होंने सुन रखा था कि जहाँ इन्द्रधनुष ज़मीन पर खड़ा होता है, वहीं वह धन गड़ा रखा है।
'ज्ञानी साथ में कई यन्त्र ले गया। जहाँ कहीं इन्द्रधनुष देख पाता, गणित से उसकी परिधि नापकर, त्रिज्या और केन्द्र की खोजकर, उपयुक्त स्थान पर खोदने लगता। कवि घास पर लेटकर सूर्य-रश्मियों से खेलता। वे उसके चारो ओर नाचतीं और उसे कल्पना-लोक की कथायें सुनातीं। कवि को हरएक वनस्पति से परिचय हो गया, हरएक पशु-पक्षी की भाषा उसे आ गई और हवा के झकोरियों पर चढ़कर आते हुए प्रकृति के मूक सन्देशों को भी वह न-जाने कैसे समझने लग गया।
'एक दिन जब ज्ञानी गम्भीर, थका-माँदा ज़मीन के भीतर से निकला, तो उसके छिले-कटे हाथों में कुछ अजीब-से पत्थर थे। वह कवि का विकसित मुख देखकर कुँलसा-सा पड़ा, बोला—"अकर्मण्य! आलसी! तुम्हें क्या हो गया है?
'किसने तुमसे कहा कि मैं आलसी हूँ?'
'तुम हमेशा यहाँ बाहर ही तो पड़े रहते हो और यहाँ मैं ज़मीन के भीतर तक धँस जाता हूँ।
'लेकिन ज़मीन की सतह पर भी तो कुछ मिल सकता है?'
'सतह पर क्या मिलेगा? पाने के लिए तो भीतर ही पहुँचना होगा। मुझे तो अभी तक ठीक स्थान नहीं मिला; पर मैंने कई अद्भुत आविष्कार किये हैं, और निश्चय है कि सफलता मिलेगी।'
'कवि ने कोई उत्तर नहीं दिया। अचानक वह रुक गया और ज्ञानी की बाँह पकड़कर इशारा करने लगा!
एक और इन्द्रधनुष!'—ज्ञानी चिल्लाया और यन्त्र निकालकर गणित करने लगा।
'परन्तु कवि की आँखें उस प्राकृतिक विभूति की अतुलनीय सुषमा का पान कर रही थीं, और तब एकाएक उसने उस चमकते हुए धनुष के पीछे एक अद्भुत सौंदर्यमयी को देखा—विषादपूर्ण, आकर्षक आँखें, काले कुंचित केश... वह शायद उसी की प्रतीक्षा कर रही थी। कुछ देर बाद वह मुड़ी और चलने लगी। पागल की भाँति कवि उसके पीछे दौड़ा—सब कुछ भूलकर, उस गुप्त धन की चिन्ता छोड़कर, अपने मित्र को छोड़कर। वह उसके पीछे दौड़ा चला जा रहा था। पहाड़ियों और मैदानों को पार करते हुए वह उसके पीछे दौड़ा चला जा रहा था। मालूम नहीं, कितने देश पीछे छूट गये, कितने लोक उसने लाँघ डाले... और फिर भी वह पीछा ख़त्म नहीं हुआ। उसने सारी दुनिया देखी और देखी उसकी पीड़ा। जहाँ कहीं भी उसने देखा, उसे वेदना ही दीख पड़ी, शायद इसलिए कि उसके हृदय के भीतर भी एक पीड़ा ही जल रही थी—प्रेम-पीड़ा। वह मोहिनी उसके आगे-आगे शान्त, धीर और फिर भी द्रुत गति से चली जा रही थी—आँधी में, तूफ़ान में, उत्तर-दक्षिण—पूर्व-पश्चिम—सदा अप्राप्य! शायद केवल एक दफ़े उसने पीछे मुड़कर कवि को देखा और तब उसकी दृष्टि ने कवि को और भी उन्मत्त कर दिया।
'हवा के पंखों पर चढ़कर वसन्त आया। और जहाँ से चली थी, वहीं वह मोहिनी आकर रुक गई। कवि ने सोचा, अब मैंने पाया... किन्तु उसी समय भयानक तूफ़ान शुरू हुआ, पृथ्वी काँप उठी, जंगल लड़खड़ा पड़ा, आकाश तमाविष्ट हो गया। कवि उसका हाथ पकड़ना ही चाहता था, तब तक उसने हाथ खींच लिया।
'तुमने धोखा खाया है।' वह दुःखपूर्ण स्वर से बोली—'मैं तुमसे भागी थी, क्योंकि मैं तुम्हें सुखी नहीं कर सकती। मेरा नाम चिन्ता है—गम्भीर वेदना, मार्मिक अनुभूति, अनन्त उलझन। इसके अतिरिक्त मेरे पास और कुछ है ही नहीं कि मैं तुम्हें दे सकूँ...
'तुमने धोखा खाया है।' वह दुःखपूर्ण स्वर से बोली—'मैं तुमसे भागी थी, क्योंकि मैं तुम्हें सुखी नहीं कर सकती। मेरा नाम चिन्ता है—गम्भीर वेदना, मार्मिक अनुभूति, अनन्त उलझन। इसके अतिरिक्त मेरे पास और कुछ है ही नहीं कि मैं तुम्हें दे सकूँ...
'आँधी ने मधुर वर्षा का रूप धारण कर लिया था। उसे चीरती हुई वसन्त-सूर्य की रश्मियाँ कवि के चारो ओर छिटक रही थीं। उसी समय ज्ञानी ज़मीन से निकला—कुछ अनमोल रत्न लिये... कवि को देखकर उसके हाथ ढीले पड़ गये और उसके हाथ से से रत्न नीचे गिर पड़े।
'ओ भाग्यवान मनुष्य!' वह चिल्लाया—'तुम ठीक उस गुप्त धन के ऊपर खड़े हो—ठीक धनुष के नीचे।
'कौन, मैं?' कवि ने मानो जागकर कहा। फिर पछाड़ खाकर गिर पड़ा और रोने लगा; बोला—'क्यों न मैं जन्मते ही मर गया! मुझे असह्य कष्ट है!
'ज्ञानी ने उदासीनता-पूर्वक सर हिलाया और फिर एकाग्रता से ज़मीन खोदना शुरू कर दिया।
'ठीक धन के ऊपर खड़ा है,' वह बोला—'और कुछ जानता ही नहीं! जब मैं बताता हूँ, तो रोता है—पागल!'
-नित्यानंद
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