अँधेरा यहाँ आकर ठिठक गया था। पतली-सी गलियारेनुमा सड़क एक अकथ्य बोझ के नीचे दबी पड़ी थी। मकानों की खिड़कियों खुली थीं, पर उनमें रोशनी नहीं थी। बारजे, छतें और खपड़ेलें चुप... विजली का खैभा चुप... हवा चुप। एक छोर पर, दूर नीम के पेड़ की पत्तियाँ अँधेरे में स्थिर परछाइयों की जाली बुन रही थीं और उन्हें देखनेवाला कोई न था। उस नुक्कड़वाले मकान के बारजे पर गमले में बेला खिल रहा था और अपनी गंध नीचे फेंक रहा था... उस फूटी लोनाखाई दीवाल में एक घोंसला था और खाली था...।
और मैं, जिसने सबकी व्यथा जी थी; एक तंग कोठरी में अकेला था। मुझसे किसी ने नहीं कहा था। सच, किसी ने नहीं, कि हज़रत! उन तमाम स्थितियों और दृष्टियों में से गुज़र जाइए और चूँकि आप कवि हैं, इसलिए सारी दुनिया का बेशुमार रंजोग़म अपने दिलोदिमाग में भर लीजिए। पर इतने से क्या होता? मैं गया था। और जाने के पहले मैंने कहा था (मुट्ठी में जैसे कुछ कसके बाँधकर) कि मैं जाऊँगा। और इस निश्चय के साथ ही (आश्चर्य!) जैसे मैं कुछ ऊपर उठ गया था। मेरी छाती के भीतर मेरी साँस कुछ बड़ी हो गई थी और मेरी आँखों में नक्षत्र चमक उठे थे। मेरे क़दम दृढ़ थे और मेरी आवाज साफ़ थी, और मेरे पीछे धुंध नहीं थी और मेरे आगे दिन एक चुनौती-भरे पथ की तरह बिछ गया था... और मैं गया था।
पर मैं कहाँ गया था? वे सारी स्थितियाँ और दृष्टियाँ तो जैसे मेरे ही भीतर से जन्मी थीं और मेरे चारों ओर छा गई थीं और मैं खंड-खंड होकर इनमें बिखर गया था।
लेकिन नहीं, इस तरह तो मैं एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकूँगा। नहीं, मुझे अपने आपको व्याख्यायित करना ही होगा। नहीं... आसमान दोनों हाथ से ढेर धूप फेंकता हुआ इस गली के ऊपर से गुज़र गया है। उसके चेहरे पर अब झुर्रियाँ हैं और गली के घरों से निकलता हुआ काला धुआँ उसको गहरा और गहरा बनाता जा रहा है। दिन में एक लथपथ आहट थी, वह समय के इस मोड़ पर धीमी हो गई है। सड़क से एक धीमी-धीमी आँच-सी निकल रही है, जिसमें गली का जीवन, गली का मन पक रहा है।... फिर रात।
पर इसके पहले कि रात हो और गहरी हो और सारे चेहरे पोंछ दे, गली के जीवन में कई चीजें घटित होती हैं। बनारसी ने बाल्टी में भर-भरकर सड़क काफ़ी दूर तक सींच दी है और उसके किनारे नाली के ऊपर अपनी बंसखट डाल दी है। बहादुरसिंह अपना चबूतरा साफ़ कर चुके, जब उन्होंने उस पर सात जन्म की कीचट दरी बिछा दी है और झूम-झूमकर राधेश्याम रामायण बाँच रहे हैं मुरारी पानवाला अपनी दुकान सजा रहा है। मदन पंडित सिर पर बनारसी साफ़ा बाँधकर और चाँदी के मूँठवाली छड़ी लेकर सत्तनरायन की कथा कहने के बहाने रमणियों का मन-रंजन करने निकल पड़े हैं। चंद्रकिशोर वर्मा खैराती अस्पताल में कंपाउंडर हैं, अब ड्यूटी से लौटकर अस्पताल से चुराई हुई दवा की गोलियाँ जेब से निकालकर शीशियों में रख रहा है। चौरस्ते के पासवाले मैदान में गायें दुही जा रही हैं और दफ्तर के बाबू लोग लुंगी लगाए अपनी-अपनी पारी के इंतज़ार में खड़े मन-ही-मन कुढ़ रहे हैं। और बेनी ग्वाला इस ताक में है कि कब दाँव लगे और कब गाय के असली दूध में डेरी फ़ार्म का मक्खनिया दूध मिला दे। पड़ोसी पहाड़न की पाँच जवान क्वांरी बेटियाँ रोज की तरह शीशा-कंघा लेकर श्रृंगार करने बैठ गई है। मुंशी नवरंगी लाल चुंगीघर से लौटकर लंगोट पहने नंग-धड़ंग ननकू पहलवान से तेल-मालिश करवा रहे हैं। बगलवाले कमरे में तीन बार लगातार हाईस्कूल में फेल हुआ छात्र तीसरे पहर से ही किताबों के ढेर पर झुका हुआ है। उसके ठीक सामने मकान में रहनेवाली बत्तीस वर्षीय मिस रसिकप्रिया मोटे फ्रेम के काले चश्मे के नीचे अपनी भेंगी आँख छिपाती बारजे पर खड़ी है और छात्र के कमरे की ओर एकटक देख रही है...।
...और नीम की पत्तियों, भूरी-पीली, खामोशी के साथ टूट-टूटकर झर रही हैं, सड़क पर और खपड़ेलों पर बिछती जा रही हैं... और बेले में नई-नई कोंपलें फूटने लगी हैं...।
...और एकांत कमरे में, जिसमें सिर्फ एक खिड़की है, दो आँखें इन्हें देख रही हैं। देख रही हैं कि गली के कंधों पर टिका आसमान उन पर झुका आ रहा है। एक भूरी रोशनी है, जिसकी तरलता में असंख्य मछलियाँ तैर रही हैं, बल्कि एक गिरोह में बँधी-बँधी एक दिशा की तरफ़ तेज़ी से भागी जा रही हैं... आँखें उनका पीछा करती हैं, पर मछलियों सेवारों में अटकती-उलझती भागी जा रही हैं... और जब तक आँखें उन्हें पकड़ पाएँ, वे स्थिर-जड़ तारिकाएँ बनकर आसमान में फैल-छितर चुकी होती है... रात।
रात का गहरा-गहरा नीला रंग, जो देखने में काला-सा लगता है। और गली के उठे हुए मकान और उस नीम की पंजरी-पंजरी टहनियों अपनी मुट्ठी-भर कमज़ोर पत्तियों के साथ जिसमें स्टेन्सिल की तरह चिपकी हुई लगती है। बिजली का खंभा रोशन है और रोशनी की एक मोटी धार उसके पीछे की लोनाखाई दीवाल पर गिर रही है... दीवाल के घोंसले में पँखों की फटफटाहट शून्य में तिर रही है... एक थिराव है, जैसे रात ने एक नदी की तरह सारी आवाज़ों को अपने भीतर घुला-मिला लिया है और समय के किनारों को छूती हुई शांत बहती जा रही है...।
पर यह मेरी दृष्टि का गलत कोण है, मेरे मन का एक मिथ्या बिन्दु, जहाँ रात है, नदी है और एकांत चुप। अतः मैं अपने को अपने से, उस दृष्टि के लगते कोण से दूर फेंक देता हूँ, और सुनता हूँ एक कुहराम, जो गली में गूँज रहा है और जिन्हें केवल दीवारें सुन रही हैं...।
बनारसी ताड़ी पीकर लौटा है और अपनी बीवी को पीट रहा है और वह उसके सात पुरखों को तार रही है। स्फूर्ति दोनों में से किसी ओर भी नहीं। बनारसी के हाथ मशीन के पुर्जे की तरह ऊपर उठते हैं और उतनी ही यांत्रिकता के साथ गिरते है। उसकी बीवी चीखती है, पर उसमें कोई आवाज नहीं, सिर्फ एक फँसी हुई रिरियाहट है। और दोनों किसी बहुत पुराने नाटक के दो घिसे हुए पात्र-जैसे लग रहे हैं, जो अपना पार्ट दुहराते-दुहराते काठ हो चुके हैं। उनके इस दैनंदिन नाटक का दर्शक कोई नहीं। चंद्रकिशोर कंपाउंडर अपनी कोठरी में लेटा मुस्करा रहा है। बनारसी की ब्रीवी की चीख़ की कमन्द पकड़कर वह झट से स्मृति के कंगूरे पर चढ़ जाता है जहाँ पिघली हुई रंगीन शाम की झिल-मिली के नीचे सलमे-सितारों-जड़ी करीमन, वहीदन, कमला, छबीली वगैरह उसका इंतज़ार कर रही हैं। गली के भीतर गली, अँधेरे के भीतर अँधेरा, और अँधेरे की सीढ़ियों पर खड़ी करीमन, वहीदन, कमला, छबीली... दुखती हुई देहें, जिन पर खूंख्वार पंजों के निशान जलते हैं, और लालसा पर नक़ली रोगन चढ़ता है और मुस्कराती हुई आँखें और फड़कती हुई भुजाएँ और थिरकता हुआ बिकाऊ जिस्म सब मिलकर एक कंटकित जंगल बनाते हैं, जिसमें दरिन्दे दहाड़ते हैं।... और जब गली का अँधेरा ऊँघने लगता है और शोख कहकहों के अनार फूटकर बुझ चुके होते हैं, रोगन उड़ जाते हैं, तितली के बनावटी पंख झड़ जाते हैं, तब उनकी नंगी देहें नशे से बोझिल रात के सैलाब में टीसते हुए टापुओं की तरह उभर आती हैं... और वे कंपाउंडर चंद्रकिशोर वर्मा का इंतज़ार करती हैं, और फीकी रोशनियों के नीचे सीढ़ियों पर चंद्रकिशोर वर्मा की चुराई हुई गोलियों की क़तार उन टीसती देहों और रात के सैलाब के बीच एक पुल की तरह बिछती जाती है और चंद्रकिशोर वर्मा अपनी घनी मूँछों में एक बहशी मुस्कान छिपाए भारी क़दमों से धप-धप करता उस पुल को पार कर जाता है...।
खयालों में डूबा चंद्रकिशोर वर्मा लेटा मुस्कराता रहता है।
... गली में लौटते हुए क़दमों की आहट। दीवारों पर बनती-मिटती परछाइयों। परछाइयों के संकेत, इशारे, भंगिमाएँ। मुरारी पानवाले की परछाई बिरहे के आलाप की तरह काँपती है और उनमें जमुनापार के एक गाँव से भगाई हुई औरत के नए खरीदे पायलों की गमक है।... मदन पंडित की रसीली आवाज़ एक दूसरी परछाई का पीछा करती हुई एक कोने में ठिठक जाती है, और दबी फुसफुसाहटों में बुनी हुई अनेक परछाइयों की मांसल गोलाइयाँ गली की स्तब्ध फ़िज़ा में तैर जाती हैं...।
तभी बारजे पर मिस रसिकप्रिया आकर खड़ी होती हैं। अँगुलियों में बेला का एक पूर्ण विकसित फूल। इधर-उधर सतर्कता से देखती हैं, फिर वह फूल सामने कमरे में किताबों के ढेर पर ऊँघते छात्र के पास फेंक देती हैं। छात्र चौंककर जग जाता है। पहले फूल और तब दीवाल में टंगी बजरंगबली की तस्वीर की ओर देखता है और फिर ऊँघने लगता है..।
इतने में एक आवाज़ गूंज उठती है। पहाड़न की पाँच बेटियों में से मंझली फ़िल्मी गाना गा रही है। आवेग में गुंथी हुई एक आवाज़ है, जो रोज-रोज घिसती जाती है। आवाज़ और आवाज की सीढ़ियाँ, अनगिनती सीढ़ियाँ-आकाश में ऊँची और ऊँची उठती हुई और उन पर चढ़ती-हाँफती मँझली...।
दृश्य एक-दूसरे को काटते चलते हैं... कटी हुई रेखाएँ नागिनों की तरह रात के सीने से चिपकी मुंडेरों से झूलने लगती है... गली में सड़क पर उतारी हुई केंचुलों का अंबार लगता जाता है... तिरस्कृत अर्थ और जलती हुई मौन समाधियाँ... मृत लोगों ने अपने असली चेहरे कहीं छिपाकर रख दिए हैं सब एक-दूसरे की आँख बचाकर आते हैं और सड़क पर पड़े तिरस्कृत केंचुल पहन लेते हैं...।
...जिस दीवाल में चिड़िया ने घोंसला बनाया था वह अभिशप्त है।... हर साल एक साँप उसके अंडों को खा जाता था... उस साँप की चमकती हुई आँखें दृश्यों के कुहराम से अचानक उठती हैं।... मैं साफ़ देखता हूँ... और धीरे-धीरे सरकती हुई, नीचे उतरकर चबूतरे के पास आती हैं, चबूतरे की दहलीज के पार... और जब वे एक स्थान पर जड़ हो चुकी होती हैं, तब मेरी दृष्टि धुँधला जाती है, पर इस धुंधलाने के पहले एक चमक के साथ में पहचान जाता हूँ...।
और आँखों के आगे बहादुरसिंह के बड़े भाई जालिमसिंह एक किंवदंती का नायक बनकर हवा पर एक बड़े-से छाले की तरह उभर आते हैं... उस छाले के भीतर दूसरे महासमर की गलित संस्कृति का विष भरा हुआ है, जिसे जालिमसिंह वर्मा के फ्रंट से लाए थे... दमघोंटू धुएँ की परतों में पनपनेवाली क्रूरता, पाशविकता, कुत्सा के कीड़े--जिसे वर्षों तक चबूतरे पर दीवाल के साये में बेबाक ठठाकों और गंदे मज़ाकों और सनसनीखेज वृत्तांतों, संस्मरणों के माध्यम से गली के इस छोर से उस छोर तक फैलाते रहे... और गली के जीवन-प्रवाह में ये कीड़े पलते रहे... और उन वर्षों में गली में खुले आम मारपीट, फौजदारी, अपहरण, गर्भपात और आत्महत्या की कई घटनाएँ हुई थीं... महासमर की उस संस्कृति के अवशेष रूप वह लोनाखाई दीवार... एक जर्जर विषाक्त परंपरा... जिसे तुड़वाने का निश्चय बहादुरसिंह कई बार कर चुके हैं, पर इस निश्चय के आगे और कुछ नहीं, बस एक सात जनम की कीचट दरी और राधेश्याम की रामायण... और कोई चिड़िया अब उस दीवार पर अपना घोंसला नहीं बनाती...।
... एकाएक मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरे छोटे-से कमरे की परिधि बढ़ गई है, आयतन चौड़ा हो गया है, दीवारें फैल गई हैं और सारी गली दृश्यों के एक छोटे-से गुलदस्ते की तरह उसके विस्तार में समा गई है, उसके सारे पात्र कठपुतलों की तरह कमरे की पूरी आलमारी के एक-एक खाने पर बैठ गए हैं... और मेरी ओर स्थिर अपलक दृष्टि से देख रहे हैं... गली की छायाएँ सिमट आई हैं और कमरे की छत पर हौले-हौले थिरक रही हैं... नीम की डालें और बेला की कलियों खिड़की से भीतर घुस आई हैं और हिल-हिलकर संकेत कर रही हैं... और गली की आवाजें एक पूँजीभूत मौन बनकर मेरी मुट्ठियों में समा गई हैं...।
मौन। और मौन को मुट्ठी में पकड़े हुए मैं।
उस मौन से ही गली को नवरूपाकार मिलेगा। और मौन के कोई चेहरा नहीं होता--मौन अनउगा बीज है समय की परतों में। संभावना-सा सपाट। और अज्ञेय।
मेरी काँपती हुई, टूटती-बिखरती हुई अँगुलियों के अधूरे संकल्प और मेरे भीतर तड़पती हुई एक बिना चेहरोंवाली गली...।
-मलयज
(हँसते हुए मेरा अकेलापन)
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