आचार्य राजेश कुमार : अतिथि संपादक (भारत-दर्शन व्यंग्य विशेषांक )
प्रिय और अत्यंत सहिष्णु पाठकों,
आज "भारत दर्शन" का यह बहुप्रतीक्षित (मतलब ऐसा मैं सोचता हूँ) व्यंग्य विशेषांक आपके धैर्यवान हाथों में सौंपते हुए मुझे जो आह्लाद हो रहा है, उसे शब्दों में बाँधना वैसा ही है, जैसे किसी राजनेता के वादों पर भरोसा करना— मुश्किल भी और हास्यास्पद भी! फिर भी, इस साहित्यिक अनुष्ठान को संपन्न करते हुए मुझे असीम प्रसन्नता हो रही है।
अगर साहित्य समाज का दर्पण है, तो व्यंग्य उस दर्पण पर जमी पाखंड की धूल को पोंछने वाला वह खुरदरा तौलिया है, जो सफ़ाई तो करता है, पर रगड़ से चमड़ी भी लाल कर देता है। व्यंग्य-तत्व हमारे मन-मस्तिष्क में बड़े ही रहस्यमयी और अजीब तरह के रसायन का स्राव करता है। यह वह रसगुल्ला है, जिसके ठीक केंद्र में गुपचुप तरीके से तीखी हरी मिर्च रख दी जाती है, जिसका पता तभी चलता है, जब वह उदरस्थ हो जाती है। व्यंग्य में ख़ुशी की चाशनी भी होती है और ग़म का खारापन भी; यह गुलाब की पंखुड़ियों की वह सेज है, जिसके नीचे करीने से काँटे बिछाए जाते हैं। यह मीठा भी है और चरपरा भी; इसमें रूठे हुए प्रेमी-सा प्यार भी है और सत्ता के गलियारों-सी अवहेलना भी। इसमें गहरी नाराज़गी है, लेकिन साथ ही रूठी हुई प्रेयसी को मनाने वाली मनुहार भी छिपी है। यह ऐसा मीठा ज़हर है, जिसे पीकर सुकरात मरा नहीं, बल्कि और ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा था!
सच कहूँ तो, व्यंग्य कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जिसे हमने पश्चिम से आयात किया हो या किसी प्रयोगशाला में बनाया हो। यह तो हमारे भारतीय समाज की नसों में कोलेस्ट्रॉल की तरह पूरी तरह से व्याप्त है! इसके दर्शन हमें हर नुक्कड़, हर चौराहे और हर पारिवारिक आयोजन में मुफ़्त में हो जाते हैं। यह हमारे डीएनए में दौड़ता है… जैसे किसी की नसों में सिंदूर… खैर, जाने दीजिए।
ज़रा याद कीजिए हमारे पौराणिक इतिहास को! महाभारत के उस भव्य सेट पर अगर द्रौपदी का वह एक छोटा-सा व्यंग्य— “अंधे का पुत्र अंधा!” — न बोला गया होता, तो क्या कुरुक्षेत्र का वह विश्वयुद्ध कभी लड़ा जाता? व्यंग्य की मारक क्षमता तो एटम बम से भी पुरानी है!
हमारे लोकगीतों में सास-बहू की मीठी नोकझोंक, जीजा-साली के चुटीले संवाद, त्योहारों पर गाए जाने वाले सीठने, यहाँ तक कि हमारे रोज़मर्रा के संबंधों में— जब पत्नी मुस्कुराकर पूछती है, “आज तो बड़े जल्दी घर आ गए?” या बॉस कहता है, “आप तो हमारी कंपनी के सबसे होनहार कर्मचारी हैं!”— इन सबमें व्यंग्य का जो माधुर्य और रहस्यमयी आकर्षण छिपा है, वह साहित्य की किसी और विधा में कहाँ? हम भारतीय तो जन्म से ही व्यंग्य जीते हैं; हम सड़क के गड्ढों में गिरकर भी यही कहते हैं, “वाह! क्या स्मार्ट गड्ढा है!”
व्यंग्य की सबसे बड़ी और मारक विशेषता यह है कि यह चुहल और विनोद का मखमली चोगा ओढ़े रहता है, लेकिन समाज के प्रति अपनी उस गंभीर ज़िम्मेदारी से बाल-भर भी पीछे नहीं हटता, जो इसे सौंपी गई है।
यह केवल गुदगुदाने वाला विदूषक नहीं है; यह वह कुशल सर्जन है, जो हास्य का एनेस्थीसिया देकर समाज के सड़े हुए फोड़ों पर अपना स्काल्पेल चलाता है। यह उन तमाम चीज़ों, विद्रूपताओं और पाखंडों पर सीधे उँगली रखने का दुस्साहसिक प्रयास करता है, जिनसे समाज को नुक़सान हो रहा है। जो नीतियाँ छद्म और हिप्पोक्रिटिकल हैं, जो मानसिकताएँ विकृत हैं— व्यंग्य उनका वस्त्र-हरण सरेआम करने से नहीं हिचकता।
साहित्य के अन्य रस— जैसे शृंगार, करुण या वीर रस— भी समाज को आईना दिखाते हैं, लेकिन जिस बाँकपन और अदा से व्यंग्य यह काम करता है, उसकी चितवन ही कुछ और होती है। वह तिरछी नज़र से ऐसे देखता है कि अच्छे-अच्छे सुजान भी उसके तिलिस्म के वश में हो ही जाते हैं। कबीरदास जी ने भी तो इसी व्यंग्य के बल पर कहा था—
“पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजूँ पहार!”
इसी चुभती हुई मधुरता, मारक आकर्षण और तिलिस्म को हमने व्यंग्य के इस महायज्ञ में समेटने की नाचीज़-सी कोशिश की है।
मैं बहुत आदर, सम्मान और खुद को दंडवत करके अपने उन सभी सहभागी व्यंग्यकारों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता— और थोड़ा-सा खौफ़ भी— व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने बहुत कृपापूर्वक अपनी उत्कृष्ट, धारदार और तेज़ाबी रचनाएँ इस अंक के लिए दी हैं। इस महायज्ञ में आपकी इन रचनाओं की आहुति ने ही इस अंक को महज़ विशेषांक से संग्रहणीय दस्तावेज़ में बदल दिया है।
इस साहित्यिक थाली में हमने हर प्रकार के व्यंजनों का प्रबंध किया है। इस अंक में आपको क्लासिक गद्य में लिखे गए मारक व्यंग्य मिलेंगे, व्यंग्य की गहरी चीर-फाड़ करती समीक्षाएँ मिलेंगी, और उन धारदार व्यंग्य-कविताओं का विशेष खंड मिलेगा, जो सीधे कलेजे में तीर की तरह उतरती हैं। वे भले ही देखन में छोटी लगें, लेकिन घाव गंभीर करती हैं। इसके साथ ही, बदलते हुए डिजिटल युग को ध्यान में रखते हुए, हमने वीडियो के माध्यम से प्रस्तुत किए जा रहे आधुनिक व्यंग्य को भी इसमें जगह दी है। यह मल्टीमीडिया-मार है!
इस महा-अंक का संपादन करना मेरे लिए किसी तपस्या से कम नहीं था— यह ज़िंदा और फुदकते हुए मेढ़कों को तराज़ू पर तौलने जैसा सुखद और चुनौतीपूर्ण अनुभव रहा! मुझे इस प्रक्रिया में असीम प्रसन्नता हुई और समाज के दोगलेपन के बारे में बहुत कुछ नया सीखने को भी मिला। मेरा यह अटूट विश्वास है कि जब आप इस अंक के पन्नों से (या स्क्रीन से) गुज़रेंगे, तो आप भी उसी बौद्धिक आनंद के गोते लगाएँगे और उन सच्चाइयों से रू-ब-रू होंगे, जिन्हें हम अक्सर कालीन के नीचे छिपा देते हैं।
अंत में, कहना चाहूँगा कि यह अंक नेताजी के एकतरफ़ा भाषण जैसा नहीं है। हमें आपकी तीखी प्रतिक्रियाओं, मीठी टिप्पणियों, बौखलाए हुए प्रश्नों, और यहाँ तक कि आपकी बेबाक शिकायतों व धमकियों की भी बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी। आपके ये शब्द ही हमारे लिए संजीवनी हैं, जिनसे हम आगे के अंकों के लिए सीखेंगे। आपके द्वारा भेजे गए सबसे मज़ेदार और तीखे पत्रों को हम "भारत दर्शन" के अगले अंक में बाकायदा आपके सुंदर से चित्र के साथ प्रकाशित करेंगे— ताकि पूरा समाज जान सके कि व्यंग्य को समझने वाले शूरवीर आज भी ज़िंदा हैं!
तो आइए, पाखंड के इस मेले में सत्य की इस सवारी का आनंद लीजिए।
पढ़ने और तिलमिलाने के भरपूर मज़े के वायदे के साथ,
आपका अपना,
राजेश कुमार