Lobhi Darzi Aur Chatur Mehman - Lok Katha

कहते हैं, बहुत समय पहले एक कस्बे में एक दर्जी अपनी पत्नी के साथ रहता था। दर्जी का हाथ सिलाई में बड़ा तेज था, पर दिल बहुत छोटा था। वह इतना कंजूस था कि एक-एक दाना गिनकर खर्च करता। उसकी पत्नी भी उसी की तरह कंजूस थी। दोनों की यही इच्छा रहती कि उनके घर कोई मेहमान न आए।

गाँव में यह बात मशहूर थी कि दर्जी के घर अगर कोई चला जाए, तो उसे पानी तक मुश्किल से मिलता है।

एक दिन दो मुसाफ़िर उस कस्बे में पहुँचे। रास्ता लंबा था और शाम भी ढल रही थी। उन्होंने सोचा, रात काटने के लिए किसी के घर ठहरना ही ठीक रहेगा। घूमते-घूमते वे दर्जी के दरवाज़े पर पहुँच गए।

मुसाफ़िरों को देखकर दर्जी का दिल बैठ गया। उसने सोचा, “अरे बाप रे! अब इन्हें खिलाना-पिलाना पड़ेगा। यह तो बड़ी आफ़त आ गई।”

वह जल्दी से भीतर गया और अपनी पत्नी से बोला,
“सुनो, एक तरकीब सूझी है। अभी मैं तुम्हें गालियाँ दूँगा। तुम भी मुझे खूब खरी-खोटी सुनाना। फिर मैं गज लेकर तुम्हें मारने दौड़ूँगा और तुम आटे की मटकी उठाकर घर से बाहर भाग जाना। मेहमान समझेंगे कि घर में भयंकर झगड़ा हो रहा है और डरकर भाग जाएँगे।”

पत्नी बोली, “ठीक है, यही करते हैं।”

थोड़ी देर बाद दर्जी दुकान में बैठा-बैठा जोर-जोर से चिल्लाने लगा,
“अरी, तुम कितनी निकम्मी हो! घर का काम भी ठीक से नहीं होता तुमसे!”

पत्नी भी पीछे क्यों रहती! वह भी गरजकर बोली,
“तुम खुद क्या बहुत बड़े काम के हो? बस दिनभर सुई-धागा चलाते रहते हो!”

देखते ही देखते झगड़ा बढ़ गया। दर्जी गुस्से में गज उठाकर पत्नी के पीछे दौड़ा। पत्नी ने तुरंत आटे की मटकी उठाई और घर से बाहर भागी। दर्जी भी उसके पीछे-पीछे चिल्लाता हुआ दौड़ पड़ा।

दरवाज़े पर बैठे मुसाफ़िर यह सब देख रहे थे। एक ने दूसरे से धीरे से कहा,
“भाई, यह झगड़ा असली नहीं लगता। मुझे तो लगता है कि यह हमें भगाने का नाटक है।”

दूसरा मुसाफ़िर मुस्कराकर बोला,
“हाँ, मुझे भी यही लगता है। चलो, हम भी देखते हैं कि आगे क्या होता है। ऊपर की मंज़िल पर चलते हैं और वहीं सो जाते हैं।”

दोनों चुपचाप सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर चले गए और आराम से लेट गए।

उधर दर्जी और उसकी पत्नी थोड़ी दूर जाकर लौट आए। उन्होंने घर में झाँका तो मेहमान दिखाई नहीं दिए। दोनों ने चैन की साँस ली।

दर्जी खुशी से बोला,
“देखा, मेरी अक्ल का कमाल! मैंने गज उठाया और वे डरकर भाग गए।”

पत्नी भी हँसते हुए बोली,
“और मेरी फुर्ती देखी? मैं मटकी लेकर ऐसे भागी कि जैसे सचमुच जान बचा रही हूँ!”

तभी ऊपर से ठहाका गूँजा और आवाज़ आई,
“और हमारी समझदारी देखो कि हम ऊपर आराम से सो रहे हैं!”

यह सुनते ही दर्जी और उसकी पत्नी के चेहरे उतर गए। उन्हें अपनी कंजूसी और चालाकी पर बड़ी शर्म आई।

दर्जी ने तुरंत ऊपर जाकर मुसाफ़िरों को नीचे बुलाया। फिर दोनों ने मिलकर उनका खूब आदर-सत्कार किया, अच्छा खाना खिलाया और सुबह उन्हें सम्मान के साथ विदा किया।

तब से लोग कहते हैं—

“कंजूसी से घर छोटा हो जाता है,
पर मेहमाननवाज़ी से दिल बड़ा हो जाता है।”


[भारत-दर्शन संकलन]