
गरीबी और भूख से बेहाल एक व्यक्ति अपना घर-बार छोड़कर परदेस जा रहा था। रास्ते में एक बेहद घना और डरावना जंगल पड़ा, जो शेर, चीते और अन्य हिंसक जानवरों से भरा था। लेकिन उस मनुष्य को अपनी बुद्धि पर अटूट विश्वास था, इसलिए वह अकेले ही कमर कसकर उस जंगल को पार करने के लिए तैयार हो गया।
वह सतर्कता से जानवरों से बचता हुआ आगे बढ़ रहा था। जब वह जंगल के ठीक बीच में पहुँचा, तो अचानक उसे एक भयानक दहाड़ सुनाई दी। आवाज़ इतनी विकराल थी कि वह समझ नहीं पाया कि यह किस जीव की है—निश्चित रूप से यह शेर की दहाड़ नहीं थी। जान बचाने के लिए वह एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ने ही वाला था कि उसकी नज़र उस आवाज़ के स्रोत पर पड़ी।
उसने देखा कि काजल के पहाड़ जैसा काला, एक विशालकाय दैत्य दहाड़ता हुआ उसकी ओर लपका आ रहा है। उसके सिर पर दो तीखे सींग थे, मुँह से बड़े-बड़े दाँत बाहर निकले हुए थे, और हाथों के नाखून चाकुओं से भी तेज़ थे। उसका सिर काँटेदार बालों से भरा था।
ऐसी भयानक मुसीबत को सामने देखकर एक पल के लिए उस आदमी का सिर चकरा गया, होश उड़ गए। लेकिन विपत्ति के उस क्षण में उसे बड़ों की सीख याद आई—'संकट में धैर्य नहीं खोना चाहिए।' उसने खुद को सँभाला और गजब की हिम्मत दिखाते हुए आते हुए दैत्य को ललकारा, "वहीं रुक जा दुष्ट! एक कदम भी आगे बढ़ाया तो तुझे भस्म कर दूँगा।"
यह सुनकर दैत्य ज़ोर से हँसा। उसकी अट्टहास से पूरा जंगल गूंज उठा। पेड़ काँपने लगे, पक्षी घोंसलों में दुबक गए और जंगल के खूंखार जानवर भी जान बचाने के लिए भागने लगे।
परंतु उस आदमी ने हिम्मत नहीं हारी। उसने और तेज़ आवाज़ में ललकार कर कहा, "ऐ मूर्ख दैत्य! तुझे मेरी शक्ति का अंदाज़ा नहीं है, इसीलिए चला आ रहा है। याद रख, तेरे जैसे कितने ही भयानक दैत्य मेरी जेब में बनी डिबिया में बंद पड़े हैं।"
यह कहते हुए उस आदमी ने तुरंत अपनी जेब से एक छोटा सा शीशा (दर्पण) निकाला और उसे दैत्य के चेहरे के सामने कर दिया। दैत्य ने जब शीशे में अपनी ही भयानक और विकराल सूरत देखी, तो वह बुरी तरह घबरा गया। उसकी बुद्धि काम नहीं कर रही थी। उसने सोचा कि निश्चय ही यह साधारण दिखने वाला मनुष्य बड़ा मायावी और शक्तिशाली है, जिसकी जेब में सचमुच ऐसे भयानक राक्षस बंद हैं।
वह भय से थर-थर काँपने लगा और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाया, "महाशय! मुझे क्षमा करें। मुझे छोड़ दें, मैं जीवन भर आपका दास बनकर रहूँगा।"
बुद्धिमान आदमी मन ही मन मुस्कुराया और बोला, "ठीक है, मैं तुम्हें छोड़ तो दूँ, पर एक शर्त पर। जब भी मैं तुम्हें याद करूँ, तुम्हें तुरंत मेरे पास हाज़िर होना होगा।"
मरता क्या न करता, दैत्य ने तुरंत शर्त मान ली। उसने अपने सिर के कुछ बाल उखाड़कर आदमी को दिए और बोला, "स्वामी, जब भी आपको मेरी ज़रूरत हो, इन बालों में से थोड़ा सा आग पर रख देना। मैं उसी क्षण उपस्थित हो जाऊँगा।" यह कहकर, आज्ञा लेकर दैत्य वहाँ से भाग खड़ा हुआ और आदमी खुशी-खुशी जंगल पार कर गया।
जंगल पार कर वह एक नगर में पहुँचा। संयोग से, वहाँ एक नामी पहलवान आया हुआ था जिसने राजा के सभी दरबारियों को कुश्ती में हरा दिया था। राजा ने घोषणा की कि जो इस पहलवान को हराएगा, उसे भारी इनाम मिलेगा। जब कोई सामने नहीं आया, तो उस दुबले-पतले आदमी ने राजा से लड़ने की इच्छा जताई।
राजा पहले तो हँसे, पर उसके बार-बार कहने पर अनुमति दे दी। अखाड़े में उतरने से पहले आदमी ने चुपके से दैत्य का बाल आग पर रखा। दैत्य अदृश्य रूप में हाज़िर हुआ। आदमी ने फुसफुसाया, "ऐसा कुछ करो कि मेरे छूते ही यह पहलवान गिर पड़े।"
जैसे ही कुश्ती शुरू हुई, दैत्य की अदृश्य मदद से, उस मरियल से दिखने वाले आदमी ने भारी-भरकम पहलवान को एक झटके में धूल चटा दी। सब दंग रह गए। राजा ने उसे बहुत सम्मान दिया और अपने पहलवानों का सरदार बना दिया।
कुछ समय बाद, नगर के पास एक आदमखोर शेर आ गया। नगर के पुराने पहलवान उस दुबले-पतले आदमी की अचानक मिली शोहरत से जलने लगे थे। उन्होंने राजा को उकसाया कि उनका नया 'सरदार' ही उस शेर को पकड़ सकता है।
राजा के आदेश पर वह आदमी जंगल गया। उसने फिर दैत्य को बुलाया। पलक झपकते ही दैत्य ने शेर को कान पकड़कर आदमी के सामने पेश कर दिया। दुम दबाए शेर को अपने नए सरदार के पीछे आते देख राजा और दरबारी हैरान रह गए। राजा ने खुश होकर उसे अपना मंत्री बना लिया।
मंत्री बनते ही उसने राजा को सलाह दी, "महाराज, मेरे होते हुए इतनी बड़ी सेना का क्या काम? इसे कम कर दीजिये।" राजा ने उसकी बात मानकर सेना कम कर दी।
पड़ोसी शत्रु राजा को जब यह पता चला, तो उसने इसे अच्छा मौका समझा और एक विशाल सेना के साथ आक्रमण कर दिया। नगर में हाहाकार मच गया। राजा ने अपने नए मंत्री को बुलाया। मंत्री ने निर्भीकता से कहा, "महाराज, घबराएं नहीं। मैं कल अकेला ही उन्हें देख लूँगा।"
अगली सुबह, उसने दैत्य को बुलाया और कहा, "शत्रु सेना को बिना रक्तपात के भगाना है।" दैत्य ने उसे कुछ अभिमंत्रित उड़द के दाने दिए और कहा, "इन्हें शत्रु सेना पर फेंक देना, बाकी मैं सँभाल लूँगा।"
वह अकेला आदमी शत्रु सेना के सामने जा खड़ा हुआ। शत्रु राजा ने हँसकर उसे पकड़ने का आदेश दिया। जैसे ही सैनिक आगे बढ़े, उसने वे दाने उनकी ओर फेंक दिए। दैत्य की माया से अचानक दिन में ही अँधेरा छा गया। शत्रु सैनिकों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, वे आपस में ही एक-दूसरे से लड़ने-भिड़ने लगे। भगदड़ मच गई।
शत्रु राजा पकड़ा गया। उस बुद्धिमान व्यक्ति ने शत्रु राजा को कैद कर अपने महाराज के सामने पेश किया। महाराज ने प्रसन्न होकर उसे शत्रु का जीता हुआ राज्य सौंप दिया और उसे वहाँ का राजा घोषित कर दिया।
इस प्रकार, अपनी बुद्धि और धैर्य के बल पर उस साधारण मनुष्य ने असाधारण सफलता प्राप्त की।
-राजाराम शास्त्री
[हरियाणा की लोक-कथाएँ, भारत-दर्शन संकलन]