यदि हम अंग्रेजी दूसरी भाषा के समान पढ़ें तो हमारे ज्ञान की अधिक वृद्धि हो सकती है। - जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी।
दीनबन्धु - भारत-दर्शन संकलन  
   Author:  भारत-दर्शन संकलन

"माँ-माँ देखो, मैं कितनी अच्छी चीज लाया हूँ!" नन्हें से बालक ने प्रसन्नचित अपनी माँ को अपनी मुट्ठी खोलकर दिखाते हुए कहा।

"अरे! ये कहाँ से ले आया! ये तो किसी चिड़िया के अंडे हैं। मुझे ऐसा लगता है कि तू चिड़िया के तीनों अंडे उठा लाया है। जब वह अपने घर लौटेगी तो बहुत रोयेगी, बेटा।"

"अच्छा माँ। यह चिड़िया के अंडे हैं। मुझे क्या मालूम था?" वह बालक अंडे वापिस रखने चला गया।

वह पेड़ पर चढ़ा और उसने सभी अंडे उसी घोंसले में रख दिए। वह पेड़ के नीचे बैठा तब तक रोता रहा जब तक कि वह चिड़िया पेड़ पर न आ गई। चिड़िया को देखकर उसका सारा दर्द खत्म हो गया। वह हँसता-कूदता घर लौट आया।

यही बालक बड़ा होकर दीनबन्धु एन्ड्रयूज कहलाया। एन्ड्रयूज गांधीजी व टैगोर के सानिध्य में जीवन भर दीन-दुखियों के उद्धार में लगे रहे।

[भारत-दर्शन संकलन]

 

 

 
 

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