हिंदी भाषा अपनी अनेक धाराओं के साथ प्रशस्त क्षेत्र में प्रखर गति से प्रकाशित हो रही है। - छविनाथ पांडेय।

सपना सिंह ( सोनश्री )

सपना सिंह ( सोनश्री )

 

 

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आज भी खड़ी वो...

निराला की कविता, 'तोड़ती पत्थर' को सपना सिंह (सोनश्री) आज के परिवेश में कुछ इस तरह से देखती हैं:

आज भी खड़ी वो...
तोडती पत्थर,
दिखी थी आपको,
...

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छवि नहीं बनती

निराला पर सपना सिंह (सोनश्री) की कविता

निराला जी, निराले थे।
इसलिए तो,
सबको, भाये थे।
आपके, शब्दों में,
जादू था ऐसा,
कि
आज भी,
गूंजते हैं वही,
जेहन में,
बार बार,
कर्नाकाश के,
अक्षय पटल पर ।
अभाव में,
भाव,
...

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