कृश्न चंदर

कृश्न चन्दर

कृश्न चन्दर (1914–1977) आधुनिक उर्दू कथा-साहित्य के उन गिने-चुने हस्ताक्षरों में से हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से न केवल समाज का दर्पण दिखाया, बल्कि प्रगतिशील चेतना को विश्व स्तर पर स्थापित किया। उन्हें 'कलम का जादूगर' और 'उर्दू अफसाने का शहंशाह' कहा जाता है।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
कृश्न चन्दर (Krishan Chander) का जन्म 23 नवंबर, 1914 को राजस्थान के भरतपुर में हुआ था, जहाँ उनके पिता डॉ. गौरी शंकर चोपड़ा मेडिकल ऑफिसर थे। उनका बचपन कश्मीर की वादियों (पुंछ) में बीता, जिसका गहरा प्रभाव उनकी बाद की रचनाओं की 'रूमानियत' पर दिखाई देता है।

उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा लाहौर के मशहूर फ़ारमन क्रिश्चियन कॉलेज से पूरी की। वे एम.ए. (अंग्रेजी), एल.एल.बी. थे। छात्र जीवन में ही वे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए थे, जिसके कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। उन्होंने वकालत की पढ़ाई की, लेकिन उनका मन साहित्य और समाज सेवा में ही रमा रहा।

साहित्यिक विशेषताएं और शैली

कृश्न चन्दर के लेखन में 'रूमानी यथार्थवाद' की प्रधानता है। उनके पास एक शायर का दिल और एक चित्रकार की दृष्टि थी।

प्रगतिशीलता: वे 'प्रगतिशील लेखक संघ' के स्तंभ थे। उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से भूख, गरीबी और विभाजन की विभीषिका पर कड़ा प्रहार किया।

मुख्य विधाएं: कहानी, उपन्यास, व्यंग्य, संस्मरण

विविधता: उनकी रचनाओं में विद्रोह, हास्य, व्यंग्य और करुणा का अनूठा मिश्रण मिलता है।

प्रमुख कृतियाँ
कृश्न चंदर ने 20 से अधिक उपन्यास और लगभग 500 कहानियाँ लिखीं। उनकी रचनाओं का अनुवाद दुनिया की अनेक भाषाओं में हुआ है।

प्रसिद्ध उपन्यास : एक गधे की आत्मकथा, शिकस्त, गद्दार, तूफ़ान की कलियाँ, काग़ज़ की नाव, यादों के चिनार।

कहानी संग्रह :   पूरे चाँद की रात, पेशावर एक्सप्रेस (विभाजन पर आधारित), अन्नदाता, नज़्ज़ारे।

प्रसिद्ध व्यंग्य :   जामुन का पेड़, एक गधा नेफ़ा में, हम तो मोहब्बत करेगा, एक गधे की वापसी। उनकी कृति 'जामुन का पेड़' आज भी व्यवस्था की जड़ता पर सबसे सटीक व्यंग्य मानी जाती है।

पुरस्कार और सम्मान
साहित्य के प्रति उनके समर्पण के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया:
1.    पद्मभूषण (1969): भारत सरकार द्वारा साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान हेतु।
2.    सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1966): उनकी शांतिवादी और मानवीय विचारधारा के लिए।
3.    स्मारक डाक टिकट: वर्ष 2017 में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में 10 रुपये का डाक टिकट जारी किया।

निधन
8 मार्च, 1977 को मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से इस महान साहित्यकार का निधन हो गया। वे अंत समय तक लिखते रहे; कहा जाता है कि जब उन्हें अंतिम दौरा पड़ा, तब भी वे एक अधूरा लेख पूरा कर रहे थे।

कृश्न चन्दर केवल एक लेखक नहीं, बल्कि एक विचारधारा थे। उन्होंने उर्दू गद्य को वह रवानगी और सादगी दी, जो आम आदमी के दिल तक पहुँचती है। उनका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना दशकों पहले था।