अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।

प्रो. राजेश कुमार

प्रो. राजेश कुमार का जन्म  23 जनवरी 1958 को उत्तर प्रदेश के मुजफ़्फ़र नगर जिले के करौदा हाथी गाँव में हुआ। 

प्रमुख कृतियाँ: व्यंग्य संकलन-ऑपरेशन हीरोराम का, मैया मोरी मैं ही माखन लगायो, मेरी शिकायत यह है कि..., पद के दावेदार, इमरजैंसी वार्ड; मेरा कमरा बदल दीजिए (कहानी संकलन); भुजिया होटल, आप कौन, दिव्यचक्षु (व्यंग्य नाटक); परसाई की पारसाई (आलोचना); बातूनी बटुआ, बैंजामिल फ़्रैंकिलन, कैलाश सत्यार्थी, हमारे पूर्वज (बाल साहित्य); त्रुटियाँ: विश्लेषण और सुधार (भाषाशास्त्र); हिंदी-रूसी शब्दकोश, रूसियों के लिए पाठ्य-पुस्तकें।

प्रमुख कार्य: वर्तमान में केंद्रीय हिंदी संस्थान की शासी परिषद का सदस्य, पूर्व में भारत सरकार के संस्थान राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षण संस्थान के निदेशक (शैक्षिक, और व्यावसायिक शिक्षा); 3 साल से अधिक समय तक रूस में भारत के जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केंद्र में प्रोफ़ेसर; अमेरिका के टेक्सस विश्वविद्यालय में 1 साल तक प्रोफ़ेसर और शैक्षिक निदेशक; गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट, एप्पल, आदि के अग्रणी भाषाविज्ञानी; आकाशवाणी दिल्ली और दिल्ली दूरदर्शन में समाचार वाचक और समाचार संपादक; अनेक लघु फ़िल्मों का निर्देशन; हिंदी समिति, यूके की हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता के राष्ट्रीय संयोजक; “प्रवासी इंडिया”, “युगतेवर”, और “हैलो इंडिया” पत्रिकाओं में संपादन सहयोग।

सम्मान: उत्तर प्रदेश साहित्य अकादमी, टेलीग्राफ़, श्री रामजी वोरा सेवा समिति, गुजरात समन्वय समिति, आदि से सम्मानित।

विदेश यात्राएँ: अमेरिका, रूस, न्यूज़ीलैंड, जर्मनी, सिंगापुर, दुबई, आदि देशों का शैक्षिक भ्रमण।

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कला कौ अंग | दोहे

लेखक का गुण एक ही करै भँडौती धाय।
पुरस्कार पै हो नज़र ग्रांट कहीं मिल जाय॥

तू लिख तारीफ़ मैं और करैं विपरीत।
लेखन ऐसे ही चलै गाल बजावन रीति॥

रोज़ चार कर काव्य सृजन एक व्यंग्य को खींच।
फ़ेसबुकवा पै छाप कै बड़ौ रचक बन लीज॥

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तेरा न्यू ईयर तो मेरा नया साल

नया साल आ गया है और हमारे महाकवि इस तैयारी में है किस अभूतपूर्व और बेजोड़ तरीके से लोगों को नए साल की शुभकामनाएँ दी जाएँ कि वे बस अश-अश करते रह जाएँ। तभी उनके मन में संदेह का कीड़ा रेंगा, जिसके चलते वे हाल ही में उन्होंने लोगों को क्रिसमस दिवस मनाने को मानसिक गुलामी का प्रतीक घोषित करते हुए, तुलसी दिवस (तुलसीदास नहीं, तुलसी पौधा) की शुभकामनाएँ थी, और इसके चलते लोगों की नज़रों में हास्यास्पद बनकर रह गए थे। जाने कहाँ से किसी ने उनके पास तुलसी दिवस की जानकारी भेजी थी, जिसे राष्ट्र प्रेम के वशीभूत होकर उन्होंने इस बात को नज़रअंदाज़ करते हुए भी फ़ॉरवर्ड करने में बहुत गौरव महसूस नहीं अनुभव किया था कि उन्हें तुलसी दिवस तू याद क्रिसमस दिवस ने ही दिलाई थी, अन्यथा तुलसी भी पहले से मौजूद थी और क्रिसमस तो खैर पहले से था ही!

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हिंदी में उर्दू शब्दों का इस्तेमाल

हम कभी-कभी शुद्धतावादी लोगों से सुनते हैं कि हिंदी में उर्दू शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। आपने इस तरह की सूची भी देखी होगी, जिसमें लोग उर्दू शब्दों के हिंदी पर्याय देते हैं और सुझाव देते हैं कि उनके स्थान पर हिंदी शब्दों का ही उपयोग करना ज्यादा उचित होगा।

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प्रो. राजेश कुमार के दोहे

नव पल्लव इठलात हैं हर्ष न हिये समात।
हिल-डुल न्यौता देत हैं मौसम की क्या बात॥

पात पात सब झरि गए जर्जर लगता ठूँठ।
नव कोंपल मुस्काय कै जीवन देती रूख॥

कोहरे ने सब लील कै सब अदृश्य कर दीन।
प्रेम किरण बरसाय कै कर दो रोशन दीन॥

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अपने-अपने युद्ध, अपनी-अपनी झंडाबरदारी

झंडा हमारा गौरव है, हमारी शान है, हमारी बान है, हमारी आन है, हमारी पहचान है। लहराते हुए झंडे को देखते ही महाकवि के शरीर में सिहरन दौड़ जाती है, वे देश-प्रेम की भावना में गोते खाने लगते हैं, मातृभूमि के लिए कुछ कर गुज़रने कि भावनाओं में बहने लगते हैं।

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पत्रकार, आज़ादी और हमला

मास्टर अँगूठाटेक परेशानी की हालत में इधर से उधर फिर रहे थे, जैसे कोई बहुत ग़लत घटना हो गई हो, और वे उसे सुधारने के लिए भी कुछ न कर पा रहे हों।

“क्यों परेशान घूम रहे हो? ऐसा क्या हो गया?" लतीपतीराम ने पूछा।

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और बुलडोज़र गिरफ़्तार हो गया

यह इतना आसान काम नहीं था, लेकिन आखिर पुलिस ने अपनी मुस्तैदी से बुलडोज़र को गिरफ़्तार कर ही लिया। बुलडोज़र के लिए हथकड़ी अभी तक नहीं बनी है, इसलिए पुलिस ने उसे रस्सों से बाँधकर ही अपने कब्जे में किया। चारों तरफ़ इस बात से हर्षोल्लास फैल गया, सरकार ने पुलिस की पीठ ठोंकी, और पुलिस ने कहा कि इस बड़ी सफलता के बाद चारों तरफ अमन-चैन, और क़ानून और व्यवस्था कायम हो गई है।

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महाकवि और धारा 420 सीसी की छूट

महाकवि रोज़-रोज़ की बढ़ने वाली क़ीमतों, पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में लगी हुई आग, और रोज़-रोज़ लगाए जाने वाले तरह-तरह के टैक्स से बहुत परेशान थे। वे अपनी वेतन पर्ची में देखते थे की उनकी तनख़्वाह तो दिनोदिन घटती जा रही है, जो टैक्स का कॉलम जो था, वह दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। उन्हें ऐसा लगने लगा था कि शायद वे अपने लिए नहीं, बल्कि सरकार के लिए ही कमाई कर रहे हैं। सरकार कर-पर-कर लगाए जा रही है, और यहाँ कर में कुछ नहीं बचता – ऐसी परेशानी में भी उन्हें कविता सूझने लगी थी।

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लेखक पर दोहे

लेखक का गुण एक ही करै भँडौती धाय।
पुरस्कार पै हो नज़र ग्रांट कहीं मिल जाय॥

तू लिख तारीफ़ मैं और करैं विपरीत।
लेखन ऐसे ही चलै गाल बजावन रीति॥

रोज़ चार कर काव्य सृजन एक व्यंग्य को खींच।
फ़ेसबुकवा पै छाप कै बड़ौ रचक बन लीज।।

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अद्भुत अकल्पनीय अविश्वसनीय

यह 2013 का साल था और मैं गुजरात में निदेशक के पद पर गया था। अपने जिस पूर्ववर्ती से मुझे कार्यभार लेना था, उसने अन्य बातों के अलावा मेरे साथ मामाजी नामक शख्सियत का जिक्र किया और बताया कि उन्होंने मुझे बता दिया था कि मेरा स्थानांतरण 16 फ़रवरी को हो जाएगा। वे बहुत दिनों से अपने स्थानांतरण की कोशिश में थे, जो हो नहीं रहा था। उन्होंने आगे यह भी बताया कि मामाजी वैसे तो नेत्रहीन है, लेकिन उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है और वे भविष्य को देख लेते हैं। उनका स्थानांतरण 16 फ़रवरी को ही हुआ था।

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