देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत वैज्ञानिक लिपि है। - रविशंकर शुक्ल।

प्रभुद‌याल‌ श्रीवास्त‌व‌ | Prabhudyal Shrivastava

Prabhudyal Srivastva










आपका जन्म 4 अगस्त 1944, धरमपुरा दमोह, मध्य प्रदेश में हुआ। आप कहानी, कविता, बाल-साहित्य, व्यंग्य इत्यादि विधाओं में साहित्य-सृजन करते हैं। आपको 'भारती रत्न', 'भारती भूषण सम्मान', 'श्रीमती सरस्वती सिंह स्मृति सम्मान', 'लाइफ एचीवमेंट एवार्ड', 'हिंदी सेवी सम्मान', 'व्यंग्य वैभव सम्मान' मिले हैं।


साहित्य कृतियाँ :

व्यंग्य संग्रह : दूसरी लाइन
बाल गीत संग्रह : बचपन गीत सुनाता चल, बचपन छलके छल छल छल
गीत सुनाता चल (बाल गीत संग्रह)
बचपन छलके छल छल छल (बाल गीत संग्रह)

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दद्दू का पिद्दू

गोटिया और लूसी के दादाजी का नाम मस्त राम है। नाम के अनुरूप वह हमेशा मस्त ही रहते हैं। व्यर्थ की चिंताओं को पाल कर रखना उनकी आदतों में शुमार नहीं है ।अगर भूले भटके कोई चिंता आ ही गई तो उसे वह सांप की केंचुली की तरह उतार फेंकते हैं। चिंता भी अकसर उनसे दूर ही रहती है। वह जानती है कि यह मस्त राम नाम प्राणी उसे अपने पास टिकने नहीं देगा ।इसलिए उसके पास जाने से क्या लाभ ।और वह दूसरे ठिकाने तलाशने निकल जाती है।

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चार बाल गीत

यात्रा करो टिकिट लेकर

टाँगे झोला कंधे पर
आया यहाँ टिकिट चेकर।
अब उनकी शामत आई
जो न चढ़े टिकिट लेकर।
उन्हें लगेगा जुर्माना
या निपटें कुछ ले-देकर।
बचना है झंझट से तो
यात्रा करो टिकिट् लेकर।

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छन्नूजी

दाल भात रोटी मिलती तो,
छन्नू नाक चढ़ाते।
पूड़ी परांठे रोज रोज ही,
मम्मी से बनवाते।

हुआ दर्द जब पेट,रात को,
तड़फ तड़फ चिल्लाये।
बड़े डॉक्टर ने इंजेक्शन,
आकर चार लगाये।

छन्नूजी अब दाल भात या,
रोटी ही खाते हैं।
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मछली की समझाइश‌

मेंढक बोला चलो सड़क पर,
जोरों से टर्रायें।
बादल सोया ओढ़ तानकर,
उसको शीघ्र जगायें।

मछली बोली पहले तो हम
लोगों को समझायें-
"पेड़ काटना बंद करें वे
पर्यावरण बचायें।

-प्रभुदयाल श्रीवास्तव


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मीठी वाणी

छत पर आकर बैठा कौवा,
कांव-कांव चिल्लाया|
मुन्नी को यह स्वर ना भाया,
पत्थर मार भगाया|
तभी वहां पर कोयल आई,
कुहू कुहू चिल्लाई|
उसकी प्यारी प्यारी बोली,
मुनिया के मन भाई|
मुन्नी बोली प्यारी कोयल,
रहो हमारे घर में|
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बूंदों की चौपाल 

हरे- हरे पत्तों पर बैठे,
हैं मोती के लाल।
बूंदों की चौपाल सजी है,
बूंदों की चौपाल।  

बादल की छन्नी में छनकर,
आई बूंदें मचल मटक कर।
पेड़ों से कर रहीं जुगाली,
बतयाती बैठी डालों पर।
नवल धवल फूलों पर बैठे,
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