हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है। - र. रा. दिवाकर।

केदारनाथ अग्रवाल | Kedarnath Agarwal

केदारनाथ अग्रवाल का जन्म 1 अप्रैल 1911 बाँदा जिले के कमासिन ग्राम में हुआ। जीविका से वकील श्री अग्रवाल छायावादी युग के मूर्धन्य प्रगतिवादी कवि थे। अनूठा शब्दचयन और भावाभिव्यक्ति में चित्रात्मकता इनकी विशेषता है।

'युग की गंगा', 'नींद के बादल', 'लोक और आलोक', 'फूल नहीं रंग बोलते हैं', 'आग का आईना', 'गुलमेहँदी', 'पंख और पतवार', 'हे मेरी तुम' और 'अपूर्वा' इनके मुख्य काव्य-संग्रह हैं। इनके कई निबंध-संग्रह भी प्रकाशित हैं। ये साहित्य अकादमी तथा 'सोवियत लैंड नेहरू' पुरस्कार से सम्मानित हुए।

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वीरांगना

मैंने उसको
जब-जब देखा,
लोहा देखा।
लोहे जैसा
तपते देखा, गलते देखा, ढलते देखा
मैंने उसको
गोली जैसा चलते देखा।

- केदारनाथ अग्रवाल

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टूटें न तार

टूटें न तार तने जीवन-सितार के।

ऐसा बजाओ इन्हें प्रतिभा की ताल से
किरनों से कुंकुम से सेंदुर-गुलाल से
लज्जित हो युग का अँधेरा निहार के !

ऐसा बजाओ इन्हें ममता की ज्वाल से
फूलों की उँगली के कोमल प्रवाल से
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महाकवि रवीन्द्रनाथ के प्रति

महाकवि रवीन्द्रनाथ के प्रति

कवि! वह कविता जिसे छोड़ कर
चले गए तुम, अब वह सरिता
काट रही है प्रान्त-प्रान्त की
दुर्दम कुण्ठा--जड़ मति-कारा
मुक्त देश के नवोन्मेष के
जनमानस की होकर धारा।

काल जहाँ तक प्रवहमान है
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