मन समर्पित, तन समर्पित और यह जीवन समर्पित चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं
जो फूल चमन पर संकट देख रहा सोता मिट्टी उस को जीवन-भर क्षमा नहीं करती । थोड़ा-सा अंधियारा भी उसको काफी है
एक भी आँसू न कर बेकार - जाने कब समंदर मांगने आ जाए! पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है,
'मैं दिल्ली हूँ' रामावतार त्यागी की काव्य रचना है जिसमें दिल्ली की काव्यात्मक कहानी है।
मैं दिल्ली हूँ मैंने कितनी, रंगीन बहारें देखी हैं। अपने आँगन में सपनों की, हर ओर कितारें देखीं हैं॥ मैंने बलशाली राजाओं के, ताज उतरते देखे हैं।
जब चाहा मैंने तूफ़ानों के, अभिमानों को कुचल दिया । हँसकर मुरझाई कलियों को, मैंने उपवन में बदल दिया ।। मुझ पर कितने संकट आए, आए सब रोकर चले गए ।
गूंजी थी मेरी गलियों में, भोले बचपन की किलकारी । छूटी थी मेरी गलियों में, चंचल यौवन की पिचकारी ॥ सावन मेरे गलियारों में, झूले पर बैठा आता था ।
तुमने हाँ जिस्म तो आपस में बंटे देखे हैं क्या दरख्तों के कहीं हाथ कटे देखे हैं वो जो आए थे मुहब्बत के पयम्बर बनकर
क्यों नाम पड़ा मेरा 'दिल्ली', यह तो कुछ याद न आता है । पर बचपन से ही दिल्ली, कहकर मझे पुकारा जाता है ॥ इसलिए कि शायद भारत भारत जैसे महादेश का दिल हूँ मैं ।
वही टूटा हुआ दर्पण बराबर याद आता है उदासी और आँसू का स्वयंवर याद आता है कभी जब जगमगाते दीप गंगा पर टहलते हैं
प्राणों से हाथ पड़ा धोना, मेरे कितने ही लालों को । बच्चों के प्राणों को हरते, देखा शैतानी भालों को ।। लूटा मुझको; नोचा मुझको, जितना भी जिसके हाथ लगा।