हे वोटर महाराज, आप नहीं आये आखिर अपनी हरकत से बाज़ नोट हमारे दाब लिये और वोट नहीं डाला
जी हाँ, हुज़ूर, मैं कवि बेचता हूँ मैं तरह-तरह के कवि बेचता हूँ मैं किसिम-किसिम के कवि बेचता हूँ।
हमनें एक बेरोज़गार मित्र को पकड़ा और कहा, "एक नया व्यंग्य लिखा है, सुनोगे?" तो बोला, "पहले खाना खिलाओ।"
नए-नए मंत्री ने अपने ड्राइवर से कहा— ‘आज कार हम चलाएँगे।’
एक महानुभाव हमारे घर आए उनका हाल पूछा तो आँसू भर लाए,
एक गधा दूसरे गधे से मिला तो बोला- "कहो यार कैसे हो?"
प्रश्न था - " नाम ?" हमने लिख दिया - "बदनाम" "काम"
बाज़ार का ये हाल है - हास्य-व्यंग्य-संग्रह
आँख बंद कर सोये चद्दर तान के, हम ही हैं वो सेवक हिन्दुस्तान के । बहते-बहते पार लगे हैं हम चुनाव की बाढ़ में,
तेरे भीतर अगर नदी होगी तो समंदर से दोस्ती होगी कोई खिड़की अगर खुली होगी