ज़रा सा क़तरा कहीं आज गर उभरता है समन्दरों ही के लहजे में बात करता है ख़ुली छतों के दिये कब के बुझ गये होते
मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा अब इसके बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
खुल के मिलने का सलीक़ा आपको आता नहीं और मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं वो समझता था, उसे पाकर ही मैं रह जाऊंगा
वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता मगर इन एहतियातों से तअ'ल्लुक़ मर नहीं जाता बुरे अच्छे हों जैसे भी हों सब रिश्ते यहीं के हैं
कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती है ये सलीक़ा हो तो हर बात सुनी जाती है जैसा चाहा था तुझे, देख न पाए दुनिया